रविवार

कामना, लालच, क्रोध को कैसे नियंत्रित करें?


Sadhvi arya Panddit
Sadhvi Arya Pandit



सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि नियंत्रण किससे होता है। बुद्धि के द्वारा मन पर जो नियंत्रण कर लेता है वही समस्त दुर्वासनाओ पर विजय प्राप्त कर लेता है पर हालत उल्टा हो गए हैं।
विषय ने इन्द्रियों को घसीट लिया है, इन्द्रियों ने मन को अधीन कर लिया है और मन ने बुद्धि को अधीन कर लिया है इसलिए हमारी दुर्गति होती जा रही है।

अब हमें ऐसा विवेक मिले जिससे हमारे बुद्धि में इतनी ऊर्जा आए की वो मन को अधीन कर लें और मन इन्द्रियों को अपने अधीन कर लें, इन्द्रियां निर्विष्य हो जाए तो सभी पाप, दुराचार, मनमानीआचरण सब बंद हो जाए।अब बुद्धि में हमारे ज्ञान कैसे आए, प्रकाश कैसे आए? लेकिन इसके लिए दो बातें हैं। खूब नाम जपते रहें और सत्संग सुने। सत्संग से हमें पता चलता है कि क्या असत्य है और क्या सत्य है। सत्संग से हमारी बुद्धि का मार्जन होता है और नाम से हमें बल मिलता है।

जैसे आप जान गए कि ये नहीं करना चाहिए तो आप और नहीं रुक पाएंगे। सिर्फ जानकारी होने से नहीं रुक पाएंगे। आप में बल चाहिए कि जो नहीं करना चाहिए, उसके लिए अपने मन को रोक सकूं। वो बल मिलता है नाम से।

जितना आप सत्संग सुनेंगे उतना ही प्रकाश आएगा। जिस प्रकार हम प्रकाश में देख सकते हैं लेकिन अंधेरे में पड़ा हुआ रस्सी का टुकड़ा भी सांप नज़र आए तो हम भयभीत हो जाएंगे। लेकिन वहीं प्रकाश हो तो हम देख पाएंगे कि भय की जरूरत नहीं है क्योंकि वो रस्सी है, सांप नहीं।

ऐसे ही अगर यह भ्रम हो कि शरीर के भागों में सुख है, पद प्रतिष्ठा में सुख है तो ये ज्ञान अंधकार में हैं और जब ज्ञान का प्रकाश होगा तो हम देखेंगे कि जहां पर हम सुख देख रहे हैं वहां तो एक बूंद सुख नहीं है।

मरु भूमि में जल का वास कैसे होता है जैसे सूर्य की किरणें पड़ी तो बालू में ऐसा लगता है कि निर्मल जल भरा हुआ है लेकिन वहां एक बूंद पानी नहीं होता। जितना आगे बढ़ते जाओ उतना आगे पानी दिखाई देता है लेकिन होता कुछ भी नहीं।

ऐसे ही मन दिखाता है कि इसमें सुख है, उसमें सुख है, इस पदार्थ में, इस व्यक्ति में सुख है और जब भोगते हैं तो हाथ में कुछ लगता नहीं क्योंकि वहां सुख है ही नहीं। फिर भी हम सुख वहीं खोजते हैं क्योंकि हमारे अंदर अज्ञान है।

इसलिए हमारी बुद्धि को बल मिले, प्रकाश मिले तो हमारी बात बन जायेगी। बल मिलता है हरी नाम से और प्रकाश मिलता है सत्संग से।

सत्संग से विवेक और विवेक से मोह, अंधकार का नाश होता है अर्थात् ज्ञान का प्रकाश होता है और जो व्यक्ति उस पर चल सके, इसका बल मिलता है नाम से।

जब हम हरी नाम जपते हैं तो हमारे अंदर आध्यात्मिक बल आता है। शारीरिक बल कोई बल नहीं है, आध्यात्मिक बल, बल है। तो आध्यात्मिक बल हमारी बुद्धि में नाम से और नाम जप सत्संग से और सत्संग के द्वारा प्राप्त आचारणों के अनुसार हम चलें तो बहुत जल्दी ही हमारे अंदर सुधार हो जायेगा और कामना, लालच, क्रोध को नियंत्रण करना सीख जाएंगे।

"साध्वी आर्या पंडित" 
श्रीमद् भागवत कथा वक्ता,
वृन्दावन, ज़िला - मथुरा - 86501 21385

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