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| Sadhvi Arya Pandit |
जब तक हम मानस पटल पर दर्शन का अभ्यास नहीं करेंगे तब तक कुछ नही होने वाला। हमारा यह मन बहुत चतुर है। दो कार्य एक साथ करने की चेष्टा करता है। जब कि आनंद की अनुभूति होती है कि एक जगह लग जाए। परंतु यह एक जगह लगता कहां है। इसका काम है दो जगह एक साथ लगना।
अगर अपने अंतर मन की वाणी को सुन रहे, देख रहे और लिख रहे तो मन को फुर्सत नहीं मिलेगी और दूसरी चीजों में मन लगेगा नहीं। जब भी मन भागने लगे तो पद गायन, नाम कीर्तन करने लगो और मन को फिर से घसीट के ले आओ। ऐसे जब आप फिर से थोड़ा शांत हो तो फिर आंतरिक जप शुरू कर दो।
हमको एक अभ्यास करना है की चंचल मन अचंचल हो जाए, यह अन्य कहीं और भागे न। आप प्रभु का नाम, प्रभु की लीला में चिपक जाएं। लेकिन ऐसा एक दिन में नहीं होने वाला है। इसके लिए आपको अभ्यास करना पड़ेगा। दीर्घकाल तक सत्कारपूर्वक निरंतर जपा जाए तो मन एक जगह लगना शुरू हो जाएगा।
मान लीजिए अगर आप दस मिनट का समय निकाल कर जप करने बैठे हैं और उसी समय आपका मित्र आकर बात करने लगे तो आपका मन बहुत बुरा मानेगा कि चौबीस घंटे में दस मिनट ही तो जप करता हूं और उसी समय दोस्त आकर बात कर रहा। मतलब मन राज़ी है।
आप देखेंगे कि उस दस मिनट में आकर आपको कोई डिस्टर्ब करने लगे तो आपका मन आपको जलाने लगेगा। अब वही मन, जब दस मिनट के लिए एकाग्र होने लगेगा तो वो संसार की तरफ भागेगा।
जो संसार के बाहरी व्यवहार से जल जाएगा कि मेरे दस मिनट में क्यों विघ्न डाला। वहीं मन उधर भागेगा। अब उसे भागने से रोक लो तो, मन ही बंधन का कारण है और मन ही मोक्ष का कारण है।
अगर मन प्रभु के चिंतन में लग गया तो आप बाज़ी जीत गए। तो अभ्यास में मन कहीं न कहीं मेरा साथ दे रहा है। अब अगर अभ्यास बढ़ाते चले जाएं तो मन पूरा राज़ी भी हो जाएगा।
"साध्वी आर्या पंडित"
श्रीमद् भागवत कथा वक्ता,
वृन्दावन, ज़िला - मथुरा - 86501 21385

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