शनिवार

जीवन में सफलता कैसे प्राप्त करें? "साध्वी आर्या पंडित" श्रीमद् भागवत कथा वक्ता वृन्दावन, ज़िला - मथुरा


Sadhvi Arya Pandit
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जिंदगी का कोई भरोसा नहीं कि शाम तक जिएंगे की नहीं जिएंगे। जिंदगी में कहां ऊंचे जाओगे, जहां भी ऊंचे जाओगे, पटक दिए जाओगे।

माया का काम है ऊंचे से नीचे पटकना। छोटे बन जाओ, कभी नहीं पटके जाओगे। भजन से क्या होता है, जानते हो? छोटा बना जाता है! अब कोई पटक के दिखाए।

मान लो तुम सीधे चित्त पड़े हो, अब तुम्हें कौन चित्त करेगा क्योंकि तुम पहले ही चित्त हो। अगर तुम्हारी इच्छा है कि कहीं ऊंचे पर चढ़े, तो इसके लिए तुम्हारी पकड़ बहुत अच्छी होनी चाहिए। अगर फिसलोगे तो हड्डी टूट जायेगी। यह ऊंचाई की चाह ही उसको नष्ट कर देती है।

रोज़ भगवान का भजन करते रहो, वो जहां पहुंचा देंगे, वहां से गिरने का कोई चांस नहीं। यही तो माया का खेल है कि वो बड़ा बनाना चाहता है, हर क्षेत्र में बड़ा बनाना चाहता है। यह दोष भी नही है क्योंकि वो बहुत बड़े का बच्चा है! भगवान का बच्चा है और भगवान तो सबसे बड़े हैं इसलिए वो सबसे बड़ा बनना चाहता है।

परंतु इस मार्ग में सबसे बड़ा बना जाता है सबसे छोटा बनकर। जो जितना छोटा बन गया, वो उतना ही बड़ा बन गया। तो सच्ची बात समझो, आप अपने आप को छोटा समझकर काम करो, तो देखना आप सबके पूज्य बन जाओगे।

लेकिन हमारी गलती क्या होती कि हमारे अंदर का अहंकार बड़ा होता है और अहंकार का काम है नाश करना, पतन करना। अहंकार बड़ा कष्टदायक है। हम समझ नही पाते, दुश्मन का साथ देते है और वही हमें मार देता है। छोटा होने से अहंकार नष्ट होता है और जहां अहंकार नष्ट होता है तो वो भगवान की कृपा का पात्र बन जाता है और सर्वमंगल हो जाता है।

भगवान से यह प्रार्थना करो कि आप जैसा भी बनाओ, जो भी बनाओ, अपना बना लो। सबसे बड़ा पद है भगवान का। हम किसके हैं? भगवान के हैं और माया किनकी है भगवान की है।

इसलिए जब आप भगवान से मिलते हो तो माया की चैकिंग बंद हो जाती है, फिर आप चाहे जिनको ले जा सकते हो। संत जनों के पास जो जुड़ते है वो संत जन डब्बा हैं। अगर कनेक्शन हटा दो तो डब्बा चलेगा क्या। इंजन है अचार्य भगवान।

पर इंजन में इतने लोग पार नहीं कर पाते जितने डब्बा में पार हो जाते हैं। इंजन में दो चार लोग बैठते होंगे और डब्बे में सैकड़ों बैठते हैं पर पावर डब्बा में कुछ नहीं है। अगर कनेक्शन इंजन से टूटता है तो वो वहीं खड़ा रह जायेगा।

इंजन है भगवान और हम सब है डब्बा। जब उनसे कनेक्शन है तो पार हो गए और अगर उनसे कनेक्शन हटा, वही खड़े रह जाओगे। अगर हम भगवान से विमुख है तो उसका परिणाम कुछ नही है और अगर हम भगवान के है तो हमारी बहुत बड़ी उन्नति है।

ये जीवन जैसे बना है कटेगा लेकिन हम अंत में भगवान के पास जायेंगे, अपने प्रभु से मिलेंगे। हमारा जन्म मरण छूट जायेगा और सदा सदा के लिए परमानंद हो जाएंगे।

उन्नति इसमें है कि हम भगवान के चरणों का आश्रय लेकर, उन पर भरोसा रखकर कार्य करें, चाहे वो जो भी हो पढ़ाई – लिखाई, नौकरी, व्यापार।

उसमें अगर हम सफल होते है तो श्री जी की जय हो और फेल होते है तो भी श्री जी की जय हो। कोई मंगल विधान होगा श्री जी का, ऐसी भावना से अगर भक्त चलता है तो वो विजय को ही प्राप्त होता है।

तो अगर हम धर्म से चलें तो वास्तविक उन्नति मिलेगी। थोड़ा कष्ट तो हो सकता है पर वो भी हमारे पाप है जिनका नाश हो रहा है।

ऐसा नहीं है कि भगवान हमें वो कष्ट दे रहे हैं। वो हमारे पूर्व के लिए हुए पाप है और जब उनका नाश हो जायेगा तो हमारे वर्तमान में किए हुए पुण्य, सुकृति हमें मंगलमय कर देंगे। इसलिए उन्नति भगवान के चरणों पर समर्पित होने पर है।

"साध्वी आर्या पंडित" 
श्रीमद् भागवत कथा वक्ता,
वृन्दावन, ज़िला - मथुरा - 86501 21385

अगर मन प्रभु के चिंतन में लग गया तो आप बाज़ी जीत गए।


sadhvi arya Pandit
Sadhvi Arya Pandit


जब तक हम मानस पटल पर दर्शन का अभ्यास नहीं करेंगे तब तक कुछ नही होने वाला। हमारा यह मन बहुत चतुर है। दो कार्य एक साथ करने की चेष्टा करता है। जब कि आनंद की अनुभूति होती है कि एक जगह लग जाए। परंतु यह एक जगह लगता कहां है। इसका काम है दो जगह एक साथ लगना।

अगर अपने अंतर मन की वाणी को सुन रहे, देख रहे और लिख रहे तो मन को फुर्सत नहीं मिलेगी और दूसरी चीजों में मन लगेगा नहीं। जब भी मन भागने लगे तो पद गायन, नाम कीर्तन करने लगो और मन को फिर से घसीट के ले आओ। ऐसे जब आप फिर से थोड़ा शांत हो तो फिर आंतरिक जप शुरू कर दो।

हमको एक अभ्यास करना है की चंचल मन अचंचल हो जाए, यह अन्य कहीं और भागे न। आप प्रभु का नाम, प्रभु की लीला में चिपक जाएं। लेकिन ऐसा एक दिन में नहीं होने वाला है। इसके लिए आपको अभ्यास करना पड़ेगा। दीर्घकाल तक सत्कारपूर्वक निरंतर जपा जाए तो मन एक जगह लगना शुरू हो जाएगा।

मान लीजिए अगर आप दस मिनट का समय निकाल कर जप करने बैठे हैं और उसी समय आपका मित्र आकर बात करने लगे तो आपका मन बहुत बुरा मानेगा कि चौबीस घंटे में दस मिनट ही तो जप करता हूं और उसी समय दोस्त आकर बात कर रहा। मतलब मन राज़ी है।

आप देखेंगे कि उस दस मिनट में आकर आपको कोई डिस्टर्ब करने लगे तो आपका मन आपको जलाने लगेगा। अब वही मन, जब दस मिनट के लिए एकाग्र होने लगेगा तो वो संसार की तरफ भागेगा।

जो संसार के बाहरी व्यवहार से जल जाएगा कि मेरे दस मिनट में क्यों विघ्न डाला। वहीं मन उधर भागेगा। अब उसे भागने से रोक लो तो, मन ही बंधन का कारण है और मन ही मोक्ष का कारण है।

अगर मन प्रभु के चिंतन में लग गया तो आप बाज़ी जीत गए। तो अभ्यास में मन कहीं न कहीं मेरा साथ दे रहा है। अब अगर अभ्यास बढ़ाते चले जाएं तो मन पूरा राज़ी भी हो जाएगा।

"साध्वी आर्या पंडित" 
श्रीमद् भागवत कथा वक्ता,
वृन्दावन, ज़िला - मथुरा - 86501 21385

कई ऐसी गलतियां होती हैं जिनको हम समझ नहीं पाते लेकिन अपराध बन जाते हैं।


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Sadhvi Arya Pandit



ये सभी चीजें होने के कई कारण होते हैं। पूर्व के पाप, वर्तमान का अज्ञात और भगवत विमुखता। प्रभु का आश्रय लेकर भगवत सम्मुख हो जाओ। जो भी व्यापार, नौकरी कर रहे हो वो भगवान का नाम लेकर उनको अर्पित कर दो, यह सेवा भी तो भगवान की है। तभी आपको आनंद मिलने लगेगा।
हम लोग प्रभु से विमुख हो गए हैं, ऐसे आचरण के हो गए कि हमारे वो कर्म जमा है जो हमको भय दिलाते हैं, विषाद दिलाते हैं, दुख दिलाते हैं। हमारे उन जमा कर्मों को भगवान ही खत्म कर सकते हैं।
आगे के कर्मों को हम उनकी कृपा से सुधार सकते हैं। वर्तमान में जो संकट आ रहा है। उसे विवेक के द्वारा हम सह सकते हैं परंतु मिटा नहीं सकते। पूर्व जमा कर्मों को भगवान मिटा देंगें।
आगे कोई गलती न हो वो आप भगवान की कृपा से सावधानी से चलें। अगर कष्ट आया तो विवेक के द्वारा सहो लेकिन यह जो भय विषाद है यह तब तक नहीं मिटेगा जब तक भगवत साक्षात्कार नहीं होगा, भगवत आश्रय नहीं होगा, भगवत भजन नहीं होगा, कुछ भी कर लो, कितना चाहे कमा लो लेकिन कभी विषाद नहीं हटेगा, कभी विश्राम नही मिलेगा, माया की भूख बढ़ती ही चली जाएगी।
भय, शोक, चिंता घेरे ही रहेंगे इसलिए भगवान की शरण में होकर उनकी लीला कथाओं को पढ़ो, सुनो, ठाकुर की सेवा करो उनके आश्रित हो तो सब सही होगा।
हमसे अंजाने में बहुत बड़े बड़े पाप हो जाते है। जैसे घर में लड़की नहीं चाहिए इसके लिए अल्ट्रासाउंड करवा के गर्भ में ही उसको मरवा दिया। यह ऐसा पाप है कि इससे ऐसे रगड़ोगे की कोई बचा नही पाएगा।
भ्रूण हत्या को कुछ माना ही नहीं जा रहा है। यह एक प्रणाली सी मान ली गई है। अगर तुम्हारे आंगन में खेलता हुआ बच्चा तुम्हें आकर थप्पड़ मार दे, कैसा लगेगा तुमको। तुम जल जाओगे, क्रोध में आ जाओगे। ऐसे ही जो तुम्हारे गर्भ में पल रहा है और तुम उसको नष्ट कर दो तो तुम्हें दुख नहीं होता। वो जो पाप आएगा न, तुम्हें नष्ट कर देगा।
तो कई ऐसी गलतियां होती हैं जिनको हम समझ नहीं पाते लेकिन अपराध बन जाते हैं। भगवान की शरण में होकर भजन करो, जिससे हमारे पाप नष्ट हो जाएंगे, नहीं तो जीवन में शांति, सुख, रुपया पैसा से नहीं मिलती, चाहे जितना जमा कर लो। अशांत और क्लेश देता ही रहता है।
किसी के कलावा बांधने से, प्रसाद बाटने से शोक दूर होने वाला नहीं। जब तक तुम्हारे अंदर ज्ञान प्रकट नहीं होगा तब तक ये अज्ञान, माया तुमको रौंदती ही रहेगी। यह जन्म इसलिए ही मिला है कि ज्ञान प्राप्त करो, भगवान की भक्ति करो और पापों से बचो तो आनंद मिल जायेगा।
आजकल पाप से बचने वाला दिमाग है ही नहीं। बस हमको रुपया पैसा मिलना चाहिए, सुख मिलना चाहिए, आनंद मिलना चाहिए लेकिन हमारे कर्म विपरीत हो रहे हैं और फल विपरीत चाह रहे हैं। बबूल लगाओगे तो आम नहीं मिलेगा।
अगर आपके कर्म ठीक हैं, भगवताश्रय है तो फल ठीक है और अगर कर्म खराब हो तो आपको वो फल मिलेगा। इसलिए डरने की जरूरत नहीं है, जितना समय बचा है काम बना लो।
भगवान का आश्रय लेकर भगवान का भजन करो, वो सब ठीक कर देते हैं। वो हर गलती को माफ कर देते हैं। अगर वो कृपालु न हो तो हम लोगो का कभी उद्धार न हो। क्योंकि ऐसे ऐसे पाप बन जाते, आचरण हो जाते हैं जो नही होना चाहिए इसलिए भगवान ही क्षमा कर सकते है। भगवान की तरफ चलो, तो वो क्षमा करके आनंद प्रदान कराएंगे।

 "साध्वी आर्या पंडित" 

श्रीमद् भागवत कथा वक्ता,
वृन्दावन, ज़िला - मथुरा - 86501 21385

रविवार

दूसरों को कैसे विश्वास दिलाएं कि मैं सही मार्ग पर हूं?


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Sadhvi Arya Pandit


ऐसा कभी नही हो सकता कि हम सभी को यह विश्वास दिला पाएं कि हम सत्य मार्ग पर चल रहे हैं। हमको अपने हृदय को साक्षी करना है, किसी और को नहीं, कोई और राज़ी हो या न राज़ी हो। इस मार्ग के प्रति ऐसा नहीं होता कि चार लोग बड़ाई करें तभी मार्ग सच्चा है।

यह मार्ग ऐसा नहीं है कि परिवार वाले, गांव वाले, नगर वाले, देश वाले हमारा सपोर्ट करे कि वाह! तुम परमार्थ पर बैठ जाओ घर में। इस तरह परमार्थ पर मत चलना, ऐसे परमार्थ पर नहीं चला जाता।

परमार्थ पर चला जाता है, चाहे सब विरोध करें, हमारे प्राण भी हमारा त्याग कर दें पर आज से हम प्रभु को अपना मानते हैं। हम भजन मार्ग पर चलेंगे, चाहे कुछ भी हो जाए, तब चला जाता है इस मार्ग में।

हमारी आपकी भक्ति कितनी सामर्थशाली है यह प्रभु जाने, लेकिन मीरा जी की भक्ति जगत जानता है कि कितनी सामर्थशाली है। लेकिन उनका देवर ही विश्वास नहीं करता था की इनका मार्ग सत्य है। संतों के बीच बैठने पर लांछन लगाता था, ज़हर दिया, मारने की बहुत प्रकार की चेष्टा की, तो फिर औरों की बात क्या।

हिरणकश्यप इतना तेजस्वी, तपस्वी, शक्तिशाली है और प्रहलाद जी का विरोध कर रहा था, घर घर में विरोध हुआ, देश, नगर, विरोध करे तो यह कौन सी बात है। हर विरोध हमारे मंगल के लिए है क्योंकि हमारा स्वभाव चिपकू है। चित्त वृत्ति जहां आ जाती है जिस व्यक्ति में, जिस विषय में, वहां आशक्त हो जाती है।

भगवान की बड़ी कृपा है कि कोई अपना कहलाने वाला न रहे, कोई हमें प्यार ना करे, सब जगह से हमें दुत्कार मिले तो हम अशरण हो जाएं और अशरण हो गए तो शरणागति प्राप्त हो जाएगी।

तो यह तो भगवान की कृपा है पर यह भाव बिल्कुल गलत है कि कोई हमारा सम्मान करे, सपोर्ट करे, हमारा यश गाए, तो इसमें तो फिर परमार्थ पर चला ही नहीं जा सकता। यह परमार्थ का स्वरूप नही हैं।

हमें चुपचाप आगे बढ़ना है, जो व्यवस्था हमारे ठाकुर जी कर रहे हैं वो हमें चाहिए। अगर हमको गाली मिल रही है, इसका मतलब अभिमान बकाया है तो भगवान उसको भी रौंद देंगे। जब तक अहंकार निर्विष्य नहीं हो जाता, रेत नहीं हो जाता, तब तक भक्ति का रंग नहीं चढ़ता।

कभी कभी भगवान अपने बड़े बड़े भक्तों को भी पिटवा के देखते हैं। जैसे कुम्हार बाजार में अपनी मटकी को पीट कर दिखाता है क्योंकि उसने उसे बनाया है और तपाया है। इसलिए कहता है कि ठोक बजा के देख लो, कितना भी आप पानी डालो, इससे रसेगा नहीं।

ऐसे ही ठाकुर जी, हमारा प्रेमपात्र पक्का हो गया है या नहीं, यह बजा कर दिखा देते हैं। भक्तों ने अपार कष्ट देखा परंतु कदम पीछे नहीं हटाया। तो आज हम उनका यश गाते हैं इसलिए हम लोगों को कमज़ोर नहीं होना चाहिए।

"साध्वी आर्या पंडित" 
श्रीमद् भागवत कथा वक्ता,
वृन्दावन, ज़िला - मथुरा - 86501 21385

भगवान प्रसन्न कैसे होंगे





आपसे पूछा जाए कि आप टीचर क्यों बने, डॉक्टर क्यों नहीं बने। तो जब आप असलियत में देखोगे कि मुझे भगवान ने बना दिया है।

मतलब यह कि आपको भगवान ने बनाया है तो आप भगवान की मान कर सेवा कीजिए। भगवत प्राप्ति में जो एक योगी को भगवत प्राप्ति होती है, वही एक गृहस्थ को भगवत प्राप्ति होती है। पर वह अपने धर्म से चले क्योंकि हम सब भगवान के सेवक हैं, सब को अलग-अलग सेवा विभाग दिया है।

पूरे विश्व में जिसको जो कार्य मिला है उसे भगवान का समझकर सच्चाई से करें तो भगवान प्रसन्न हो जाएंगे क्योंकि भगवान ने ऐसा ही उपदेश किया है। भगवान का स्मरण रहे और आप अपने कर्तव्य को सच्चाई से करें, इसी से भगवान प्रसन्न हो जाएंगे और भगवत प्राप्ति हो जाएगी।

"साध्वी आर्या पंडित" 
श्रीमद् भागवत कथा वक्ता,
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कामना, लालच, क्रोध को कैसे नियंत्रित करें?


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सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि नियंत्रण किससे होता है। बुद्धि के द्वारा मन पर जो नियंत्रण कर लेता है वही समस्त दुर्वासनाओ पर विजय प्राप्त कर लेता है पर हालत उल्टा हो गए हैं।
विषय ने इन्द्रियों को घसीट लिया है, इन्द्रियों ने मन को अधीन कर लिया है और मन ने बुद्धि को अधीन कर लिया है इसलिए हमारी दुर्गति होती जा रही है।

अब हमें ऐसा विवेक मिले जिससे हमारे बुद्धि में इतनी ऊर्जा आए की वो मन को अधीन कर लें और मन इन्द्रियों को अपने अधीन कर लें, इन्द्रियां निर्विष्य हो जाए तो सभी पाप, दुराचार, मनमानीआचरण सब बंद हो जाए।अब बुद्धि में हमारे ज्ञान कैसे आए, प्रकाश कैसे आए? लेकिन इसके लिए दो बातें हैं। खूब नाम जपते रहें और सत्संग सुने। सत्संग से हमें पता चलता है कि क्या असत्य है और क्या सत्य है। सत्संग से हमारी बुद्धि का मार्जन होता है और नाम से हमें बल मिलता है।

जैसे आप जान गए कि ये नहीं करना चाहिए तो आप और नहीं रुक पाएंगे। सिर्फ जानकारी होने से नहीं रुक पाएंगे। आप में बल चाहिए कि जो नहीं करना चाहिए, उसके लिए अपने मन को रोक सकूं। वो बल मिलता है नाम से।

जितना आप सत्संग सुनेंगे उतना ही प्रकाश आएगा। जिस प्रकार हम प्रकाश में देख सकते हैं लेकिन अंधेरे में पड़ा हुआ रस्सी का टुकड़ा भी सांप नज़र आए तो हम भयभीत हो जाएंगे। लेकिन वहीं प्रकाश हो तो हम देख पाएंगे कि भय की जरूरत नहीं है क्योंकि वो रस्सी है, सांप नहीं।

ऐसे ही अगर यह भ्रम हो कि शरीर के भागों में सुख है, पद प्रतिष्ठा में सुख है तो ये ज्ञान अंधकार में हैं और जब ज्ञान का प्रकाश होगा तो हम देखेंगे कि जहां पर हम सुख देख रहे हैं वहां तो एक बूंद सुख नहीं है।

मरु भूमि में जल का वास कैसे होता है जैसे सूर्य की किरणें पड़ी तो बालू में ऐसा लगता है कि निर्मल जल भरा हुआ है लेकिन वहां एक बूंद पानी नहीं होता। जितना आगे बढ़ते जाओ उतना आगे पानी दिखाई देता है लेकिन होता कुछ भी नहीं।

ऐसे ही मन दिखाता है कि इसमें सुख है, उसमें सुख है, इस पदार्थ में, इस व्यक्ति में सुख है और जब भोगते हैं तो हाथ में कुछ लगता नहीं क्योंकि वहां सुख है ही नहीं। फिर भी हम सुख वहीं खोजते हैं क्योंकि हमारे अंदर अज्ञान है।

इसलिए हमारी बुद्धि को बल मिले, प्रकाश मिले तो हमारी बात बन जायेगी। बल मिलता है हरी नाम से और प्रकाश मिलता है सत्संग से।

सत्संग से विवेक और विवेक से मोह, अंधकार का नाश होता है अर्थात् ज्ञान का प्रकाश होता है और जो व्यक्ति उस पर चल सके, इसका बल मिलता है नाम से।

जब हम हरी नाम जपते हैं तो हमारे अंदर आध्यात्मिक बल आता है। शारीरिक बल कोई बल नहीं है, आध्यात्मिक बल, बल है। तो आध्यात्मिक बल हमारी बुद्धि में नाम से और नाम जप सत्संग से और सत्संग के द्वारा प्राप्त आचारणों के अनुसार हम चलें तो बहुत जल्दी ही हमारे अंदर सुधार हो जायेगा और कामना, लालच, क्रोध को नियंत्रण करना सीख जाएंगे।

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वृन्दावन, ज़िला - मथुरा - 86501 21385

शनिवार

नौकरी, दुकान, व्यापार करते हुए रखें इन बातों का ध्यान, अवश्य भगवान मिल जाएंगे!

 

Sadhvi Arya Pandit
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नौकरी, दुकान, व्यापार करते हुए रखें इन बातों का ध्यान, अवश्य भगवान मिल जाएंगे!

हम लोग भजन का मतलब समझते है कि एकांत गुफा में बैठकर किया जाता है या एकांत कमरे में किया जाता है उसे ही भजन कहते हैं। ये भी भजन का एक अंग है लेकिन उसे सांगोपांग भजन नहीं करते हैं। सांगोपांग भजन में पहले ये स्वीकार किया जाता है कि सम्पूर्ण श्रृष्टि श्री भगवान की है।

हम इस श्रृष्टि में भेजे गए हैं अलग अलग सेवाओं के लिए। कोई डॉक्टर है, कोई मास्टर है। विविध प्रकार के अभिनय करके हम को स्वामी से इनाम लेना है। अगर शिक्षक ने भागवत भाव से बालकों को पढ़ाया तो वो भजन ही है।

ऐसे ही एक युद्ध क्षेत्र में खड़ा हुआ सूर्यवीर सामने खड़े सैनिक को मार कर देश की रक्षा करता है, उसका वो भजन ही है और भजन से कम नहीं। क्योंकि वो अपने धर्म के लिए युद्ध में वार कर रहा है।

अधर्म से किया हुआ हर कार्य निष्फल है और धर्म से किया हुआ हर कार्य भजन है क्योंकि ये श्रृष्टि भगवान की है। हमें ये समझना होगा कि हमें जो अभिनय मिला है उसमे बेईमानी न करें। अगर आप सत्यता से चलेंगे, वही आपका भजन बन जाएगा। उसी से भगवान प्रसन्न हो जाएंगे।

लेकिन अगर आप में अपने अभिनय को लेकर अभिमान आ गया तो उपासना की वृत्ति का नाश हो जाना है। इसलिए एक छोटा सा कार्य भी आपको भगवत प्राप्ति करा सकता है। अगर हम सब अपने धर्म से चलें, अपने कर्तव्य को ही भगवान की पूजा मान लें। तो जो जहां है उसको अलग से कोई मार्ग चयन नहीं करना पड़ेगा और उसे वही से भगवान की प्राप्ति होगी।

Mathura Vrindavan

जब मरेंगे तो भगवान की कृपा को प्राप्त करेंगे। मनुष्य जीवन का लक्ष्य ही यही है।

Sadhvi Arya Pandit जिस दिन आपको नियम टूटने पर सही में बुरा लगने लगेगा, उस दिन के बाद नियम टूटेगा ही नहीं। मान लीजिए आप 500 रुपए के प्रॉफिट क...