रविवार

जब मरेंगे तो भगवान की कृपा को प्राप्त करेंगे। मनुष्य जीवन का लक्ष्य ही यही है।

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Sadhvi Arya Pandit

जिस दिन आपको नियम टूटने पर सही में बुरा लगने लगेगा, उस दिन के बाद नियम टूटेगा ही नहीं।

मान लीजिए आप 500 रुपए के प्रॉफिट के लिए काम करते हैं लेकिन आपको मिला 450 रुपए ही तो आपको कैसा लगेगा। उस 50 रुपए के लिए आप सोचेंगे न की मेरा नुकसान हो गया और ध्यान रखेंगे की आगे से ऐसा घाटा न होने पाए। लेकिन क्या भजन के लिए हम ऐसा सोचते हैं।

अगर हम रोज दिन में 6 बार माला जपते हैं और आज न जपे तो इससे आपको कुछ नही होगा लेकिन यही यदि आपको एक दिन भोजन न मिले तो समझ में आ जाएगा।

भगवान के भजन को छोड़ सकते हैं कोई परेशानी नही, गुरु जी के नियम छोड़ सकते हैं कोई परेशानी नहीं लेकिन हमारा जिस पर महत्व है जैसे संसार के धन पर, संसार के भोगों पर, अगर उसकी थोड़ी सी हानि हो जाए तो हमारा चिंतन खिच जाता है, बर्दाश नहीं होता है।

मतलब आप धन और भोगों से अधिक भगवान का भजन नहीं मानते हैं अगर मान ले तो दिन में अगर भजन नहीं हो पाए तो रात को सोऊंगा नहीं, पहले उस नियम को पूरा करूंगा फिर सोऊंगा क्योंकि ऐसे हमारा नियम टूट जायेगा।

आप सोचेंगे कि आज नहीं किया, कल डबल करेंगे, पर मन तुम्हें फिसला देगा, न डबल होगा न सिंगल। मन बहुत शैतानी करने वाला होता है इसलिए इसे नियम से बांधना चाहिए। नियम जो ले, उसका निर्वाह करें। चाहे जैसी परिस्थिति आ जाए, नियम नहीं छोड़ना है, तभी भगवत प्राप्ति होती है, कोई भी बात तभी सफल होती है जब उसमें नियम हो।

हम लोग नियम का कितना आदर करते हैं। जब नियम का आदर करोगे तब तो नियम चल पाएगा न। लेकिन नियम का आदर ही नहीं है। जो नहीं खाना तो नहीं खाना, जो हमारे मार्ग में बाधक है, नही बात करनी।

हमें भजन करना है, धर्म से और परिवार का पोषण करना है, जितने दिन जिएंगे, नियम से जिएंगे और जब मरेंगे तो भगवान की कृपा को प्राप्त करेंगे। मनुष्य जीवन का लक्ष्य ही यही है।

अब कुछ नियम ही नहीं है, आज कसम खाई कल तोड़ दी, तो फिर फायदा क्या। जो नियम है ना कि मर चाहे जाओ, 24 घंटे में नियम लिया है, इतनी माला करने का, कुछ भी हो फिर चाहे भूखे रहें, सोए नहीं लेकिन माला पूरी करेंगे।

तो भगवान देख रहे हैं कि भजन के लिए आप कितने पाबंद है तो फिर वो भी कृपा करेंगे। अपने लोगों का क्या है, मनोरंजन स्वभाव है, दो माला घुमा ली, फिर नहीं लगा मन तो छोड़ दिए।

हमें पश्चाताप होता है क्या भजन छूटने में, जलन होती है, कभी रोए कि इतनी बड़ी हानी हो गई, हमारा भजन छूट गया? भजन के प्रति महत्व ही नहीं है, भगवान की तरफ प्रियता ही नहीं है, धर्म का महत्व ही नहीं हैं, नहीं तो रोने क्या एक मिनट के लिए भगवान के लिए याद भूल गई तो मन व्याकुल हो जाए, तड़पने लग जाते।

हमारी बहादुरी से हम अपने मन को चेला बनाकर भगवान का बना दे, तो हम बहादुर है।

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Sadhvi Arya Pandit

जैसे फूल में पराग आ जाता है तो भौरें मंडराने लगते है। ऐसा ही जब भगवान की कृपा होती है भक्ति का प्रचार अपने आप होता है। मतलब भक्ति में तो मुझे जुड़ना है और उसका प्रचार अपने आप हो रहा है। अगर हम प्रचार करने उतरेंगे तो माया इतनी बलवान है कि फिसल के वहां खड़ा कर देगी, जहां हमारे अंदर भक्ति ही नहीं रह जायेगी।

अपने को ठसाठस भक्ति में भर लो। भगवान कहते हैं कि जो मेरी भक्ति से युक्त हैं वो त्रिभुवन को पावन कर सकता है। ये कोई बुद्धिगत नहीं है कि हम किसी को बदल सकते हैं।

हमारी बहादुरी से हम अपने मन को चेला बनाकर भगवान का बना दे, तो हम बहादुर है। हम दूसरों को तो उपदेश दे सकते हैं पर अपने मन को चेला नहीं बना पाए। जब हम अपने मन को उपदेश देकर सही मार्ग पर नहीं चला पाए तो हम दूसरों का क्या कल्याण कर लेंगे।

अगर हमने खीर बनाकर खुद पाई नहीं और रोज खीर का प्रवचन कर रहे हैं तो वो खीर का प्रवचन किसी को नहीं लुभाएगा। पहले डटकर बनाओ और पेट से गले तक पाओ और पचाओ। जब पच जाएगा तब आप खीर का वर्णन करोगे तब आपके मुंह की मुस्कुराहट, पाने का स्वाद दूसरों को आकर्षित कर देगा।

ऐसे ही हम भगवतानंद की बातें तो बहुत करते है पर जब तक खुद भगवतानंद को महसूस नहीं किया तब तक किसी पर प्रभाव नहीं पड़ेगा इसलिए पहले खुद को समर्थ बनाओ।

अध्यात्म में जनकल्याण स्वयं होता है, किया नहीं जाता। जब आप खुद से न महसूस कर लें कि, हे हरि! मैं तो किसी योग्य नहीं, मैं तो आपका एक तुच्छ दास हूं, तब योग्यता आएगी जन कल्याण की। और जब हम जान कल्याण करने उतरेंगे तो देखेंगे कि जन है ही नहीं, क्योंकि उसको सब जगह ही श्री हरी दिखाई देंगे।

तो बात यहां यह समझनी है कि अपना चश्मा ठीक करना है और अपना हृदय भक्ति से भरना है फिर सब मंगल ही मंगल होगा।

कथा व्यास- "साध्वी आर्या पंडित" श्रीमद् भागवत कथा वक्ता 86501 21385 वृन्दावन, ज़िला - मथुरा

गृहस्थी में माया क्या सताती है? मेरा शरीर, मेरी पत्नी, मेरे बच्चे और कुछ ऐसी व्यवस्था हो जाए

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Sadhvi Arya Pandit


सिर्फ गृहस्थ जीवन में नहीं, भगवत मार्ग पर भी माया बहुत परेशान करती है। आप क्या सोचते हो की यह केवल गृहस्थी को ही परेशान करती है पर ऐसा नहीं है, वो तो धज्जियां उड़ा देती है, अभी आपने देखा नही है न क्योंकि आप गृहस्थी में रहते हो।

यह चढ़ते हुए को घसीट के रौंदते हुए हजारों हाथ नीचे दबा दे। अगर कोई बच सकता है तो केवल भगवान की शरणागति से। यहां ज्ञान, विज्ञान, बुद्धि काम नहीं करती।

परंतु जिसकी बुद्धि भगवान के चरणों में अर्पित है वही जीत सकता है। ऐसा नहीं होता है कि केवल गृहस्थ में माया सताती है विरक्ति में नहीं बल्कि यह गृहस्थी में कम सताती है विरक्ति में ज्यादा सताती है।

ऐसा इसलिए क्योंकि गृहस्थी तो चार दिवारी के अंदर है न और विरक्ति मतलब वो उस लाइन से बाहर निकल गया और उसे वापिस से लाइन में लाना है। जैसे कोई योद्धा शत्रु पक्ष की ओर चला गया तो उसे पुनः लाइन में लाना होगा।

लेकिन माया उसके लिए पूरा जोर लगा देगी कि हमारी अधीनता से तुम बाहर कैसे जा रहे हो और उसके जोर को जो सह गया, उसी को महात्मा कहते है।

गृहस्थी में माया क्या सताती है? मेरा शरीर, मेरी पत्नी, मेरे बच्चे और कुछ ऐसी व्यवस्था हो जाए कि खाए, पिए आनंदपूर्वक रहने और घंटा दो घंटा आरती पूजा भी भगवान की करते रहें। सात्विक पुरुषों के अंदर, सबके अंदर यही भावना है कि हे भगवान! भले हमे तुम कुबेर का खजाना मत दो पर इतना हो कि समाज में प्रतिष्ठा बनी रहे, परिवार स्वस्थ रहे। पर ऐसा होगा नहीं, न किसी के साथ होता।

क्योंकि दो कर्मों से हमारा शरीर रचा गया है– पाप और पुण्य। जब पाप का फल आएगा तो भयंकर आएगा। रोग, दुःख, विपत्ति, नाना प्रकार के संकट और जब पुण्य का फल आएगा तो उत्साह, आनंद, उत्सव आदि सब चलेगा। ये दोनों ही चलेंगे जैसे दिन और रात। इसलिए कोई भी ऐसा नहीं है जिसके जीवन में दुःख न आया हो। इस श्रेणी में भगवान ही क्यों न प्रकट हुए और दुःख न आया हो, ऐसा तो नहीं।

हमें तो उतना दुःख आया ही नहीं है जितना भगवान के अवतार लेने पर उनको दुख आया है– चाहे वो कृष्ण अवतार हो या राम अवतार हो। भगवान ने अवतार लेकर बताया है कि दुःख और सुख दोनों चलते रहेंगे।

एक सुख ऐसा भी है जहां इन दोनों का प्रवेश नहीं है उसे कहते हैं भगवतानंद, जो दुख सुख से परे है। जो सुख दुख में समान, लाभ हानि में समान, अजय पराजय में समान, वो परम सुख भगवान का है।

तो अगर गृहस्थी में रहकर भी नाम जप किया जाए, भगवान की आराधना की जाए और यह भाव रखा जाए कि हम भूखे हैं तो आपकी मर्जी, छके है तो आपकी मर्जी, आप जैसे दिला रहे हो, हम राजी है, तो माया पार हो जाओगे।

उनसे मांग ज्यादा रखने से माया पार नहीं होने वाली। वो आपके भजन साधनों से मांग तो पूर्ण कर देंगे लेकिन उसका क्या फायदा। इसलिए भगवान से यह मांगे कि मेरा यह जीवन और इस जीवन के बाद जिसमें मंगल हो वही करना। भले मैं कुछ भी मांगना रहूं, मत देना।

जब हम भगवान के शरण में होंगे, हमें कोई माया परेशान नहीं कर सकती।

कथा व्यास- "साध्वी आर्या पंडित" श्रीमद् भागवत कथा वक्ता 86501 21385 वृन्दावन, ज़िला - मथुरा

मंत्र जप करें या नाम जप, जानिए "साध्वी आर्या पंडित"

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Sadhvi Arya Pandit


फल पर दृष्टि रखना छोड़ दो। हमको सबसे बड़ा फल यह देखना है कि आराध्य देव से मन जुड़ा हुआ है या नहीं।

हमारी जीभ्या, हमारी सर्वेंद्रियां, हमारी चेष्ठा आराध्य देव से जुड़ी हुई है या नही। जिसका लक्ष्य अखंड स्मृति होता है वो इन सब बातों को नहीं देखता। वो देखता है कि हम पद गा रहे हैं तो उनका गा रहे हैं, सेवा कर रहे हैं तो उनकी कर रहे हैं, नाम जप रहे हैं तो उनका कर रहे हैं, नृत्य कर रहे हैं तो उनके लिए कर रहे हैं, व्यापार कर रहे हैं तो उनके लिए कर रहे है। उनसे जुड़ना परमंगल है।

संसार से जुड़ना परम् हानिकारक है। मेन चीज समझनी है कि लक्ष्य पर रहिए तो कभी दुख नहीं होगा, नहीं तो वाचिक जपने से 100 गुना फल उपान्स में है। उपान्स जपने से हज़ार गुना फल मानसिक में है। मानसिक कुछ होता नहीं, तो हो गया फल खत्म।

हम अगर फलों की तरफ दृष्टि रखेंगे तो हमारा भजन सही नहीं हो पाएगा। हमें दृष्टि रखना है आराध्य देव से चित्त जोड़ना है। एक एक वृत्ति प्रभु में जुड़ रही है यही हमारा वर्तमान का फल है।

हम प्रभु का स्मरण कर रहे है, प्रभु का नाम जपते हुए, लीला गहन करते हुए, सेवा करते हुए, हमें यही चाहिए और स्मृति का जो फल होता है वो बहुबंधन से मुक्त होकर भगवान की सेवा में जाना होता है।

उनका नाम, उनका रूप, उनका गुण, उनका लीला ही हमारे चिंतन में चल रही है, बस हमें और कुछ नहीं चाहिए। भगवत स्मृति ही साधना का सार है। हर समय स्मरण में डूबे रहे, इससे बड़ी सिद्धि क्या होगी।

अगर हम सोचते रहेंगे कि पवित्र अवस्था नहीं है, मंत्र जप सकते नहीं, नाम का फल वो है नहीं, तो नाम में अश्रद्धा हो गई, मंत्र जपने का समय नहीं तो सब गड़बड़ हो जायेगा।

हमें प्रभु से जुड़े रहना है। हमारी चित्त वृत्ति प्रभु में जुड़ी रहे। वो नाम के द्वारा, गुण के द्वारा, मंत्र के द्वारा हम प्रभु से जुड़े रहें। ये बात ध्यान रखोगे तो बहुत आनंद रहेगा।

फल में रस होता है और हमारी दृष्टि रस में रहे। रस है प्रिया प्रीतम प्रभु और अगर फल पर दृष्टि रहेगी तो बड़ा कन्फ्यूजन होगा कि इसका फल ये होगा, उसका फल वो होगा, अब ये करना चाहिए पर हो नहीं रहा तो बड़ा परेशान है।

अगर नहीं भी वृद्धि हो रही है तो हम प्रभु के हैं, प्रभु से जुड़े हुए हैं, बस इतने से सर्वमंगल हो जाएगा।

"साध्वी आर्या पंडित" श्रीमद् भागवत कथा वक्ता 86501 21385 वृन्दावन, ज़िला - मथुरा

शास्त्र के अनुसार भगवान आदेश करते हैं कि क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए।

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Sadhvi Arya Pandit

किसने कहा कि घर छोड़ना चाहिए, माता– पिता को छोड़ दो। शास्त्र के अनुसार भगवान आदेश करते हैं कि क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए।

दो मार्ग है– एक है प्रवृत्ति मार्ग और दूसरा है निवृत्ति मार्ग। निवृत्ति मार्ग का अर्थ है सन्यास मार्ग। इस मार्ग पर जब हम चलते हैं तो माता पिता को प्रणाम करके, उनसे अनुमति लेकर आजीवन उनसे न मिलने का वैराग्य लेते हैं।

जिस दिन से जन्म भूमि से निकले, सब खत्म। माता पिता, भाई बहन, बंधु परिवार अब हमारे भगवान के अलावा कोई नहीं। जिस रसोई में बचपन में खेलते हुए भोजन खाया, उससे निकले तो आज तक उस रसोई में कौरा नही तोड़ा।

जिस मां ने पालन पोषण किया, उसी मां के आशीर्वाद से निकले। वो पधारी, क्या हुई जीवन में नहीं देखा। यह है हमारा निवृति मार्ग।

लेकिन गृहस्थ मार्ग पर चल रहे हैं तो माता पिता को भगवान मान कर उनकी सेवा करते हुए खूब नाम जप करो, वहीं भगवत प्राप्ति होगी। ऐसा नहीं है कि प्रवृत्ति मार्ग पर चलोगे तो ही भगवत प्राप्ति हो।

स्वभाव के अनुसार भगवान सब जीव को मार्ग देते हैं। हमारे कुछ पूर्वज का भजन ऐसा रहा होगा कि भगवान ने हमें इस राह पर चलने के लिए रास्ता दिखाया।

पर निवृति मार्ग पर चल कर जो फल मिलता है वो फल तुम्हे प्रवृत्ति मार्ग पर चल कर भी मिल जायेगा। बस अपने माता पिता को भगवान मानो, खूब सेवा करो, कमाओ खाओ, उनको दुलार करो, समाज सेवा में उतर कर आओ और नाम जपने का निरंतर अभ्यास करो, ऐसे भी भगवत प्राप्त हो जाओगे।

जब हम वैराग्य की बात करते हैं तो उनके लिए कहते हैं जिन्होंने वैराग्य पाठ का चयन कर लिया है, जो वैराग्य में चल रहे हैं, जो आगे बढ़ गए हैं। कदम आगे बढ़ गए तो पीछे लौटना नहीं है, चाहे जो हो जाए।

लेकिन आप जिस वेश में हो, उसी के अनुसार चलना चाहिए। इसलिए आपको तो किसी ने आज्ञा नहीं दिया है कि माता पिता को छोड़ दो। अब अगर कोई मनमानी आचरण करे तो किसी का कहां बस है किसी पर।

इसलिए लोगों की कही सुनी पर मत जाइए। अपने मन की सुनो और अपने मार्ग पर चलते जाओ।

"साध्वी आर्या पंडित" 
श्रीमद् भागवत कथा वक्ता,
वृन्दावन, ज़िला - मथुरा - 86501 21385




शनिवार

तुम्हारे रोम रोम में भागवत शक्ति जागृत हो जाएगी।


sadhvi arya pandit
Sadhvi Arya Pandit



शक्ति भगवान के अधीन है और समस्त शक्तियों के स्वामी भगवान है। हम भगवान का आश्रय लेते हैं। पिता की प्रॉपर्टी का अधिकार पुत्र ही होता है, हम किसी पड़ोसी के लड़के को तो प्रॉपर्टी का अधिकार नहीं बनाते न। भले ही अपना लड़का कितना भी मूर्ख हो और पड़ोसी की कितना भी होशियार हो लेकिन सरकारी कानून के अनुसार उसी के पुत्र को प्रॉपर्टी का अधिकार है।

ऐसे ही अगर शक्ति हमें चाहिए तो शक्तिमान हमारे प्रभु पिता है, हमारे अंग है, हमारे स्वामी है। पहले यह स्वीकार करो की हमारे मालिक प्रभु हैं। अब स्वामी का खूब दुलार करो, उनकी आज्ञा अनुसार चलो, नाम कीर्तन, गुण कीर्तन करो तो तुम्हें कुछ भी मांगना ही नहीं पड़ेगा। तुम्हारे रोम रोम में भागवत शक्ति जागृत हो जाएगी।

शक्ति का तात्पर्य होता है आध्यात्म बल न कि देह बल। आध्यात्मिक बल जागृत होगा तो कामनाओं का त्याग होगा, दृढ़ों की सहनशक्ति आयेगी, विकारों पर विजय प्राप्त होगी। ये सब भागवत शक्ति है। जो गाली दे रहा है, उसको पलट कर जवाब नहीं दिया, जिसने पीटा उसका मंगल मनाए इसे कहते हैं शक्ति।

ये भागवत शक्ति उसको प्राप्त होती है जो भगवान का निजी दास हो जाता है उसे मांगने की जरूरत नहीं होती। जैसे पिता की संपत्ति पर पुत्र स्वयं अधिकार प्राप्त कर लेता है वैसे ही भगवान की शरणागत, भगवान की समस्त वैभव का वो स्वयं अधिकारी हो जाता है। बस, लाडले प्रभु से अपनापन करने की जरूरत है।

अगर शक्ति को अधीन करना चाहे तो फिर शक्ति तुम्हें नष्ट भी कर देगी। शक्ति को अधीन करना केवल भगवान की बात है, दूसरों की नहीं। बच्चा बन जाओ तो जैसे बच्चा आगे आगे भागता है और मां पीछे पीछे भागती है क्योंकि मां प्यार से अधीन है, बछड़े के शक्ति से नहीं।

ऐसे ही भक्त जहां जहां अपने चरण रखता है भगवान वहां वहां अपने हाथ रख देते हैं। इससे अच्छी शक्ति और क्या हो सकती है कि भगवान पीछे डोल रहे हैं। लेकिन कैसे, प्यार से!

अगर आपने भगवान को अपना जीवनधन माना है तो भगवान ने उसको अपना बना लिया। जैसे बछड़ा आगे उलरते हुए जाता है, उसको मां की चिंता नहीं पर मां पीछे दौड़ रही कि बछड़े को कोई विघ्न न पड़ जाए।

ऐसे ही भक्त को कहीं संकट आया तो भगवान अपने आप आ जाते हैं। इसलिए भगवान का आश्रय ही सबसे बड़ी शक्ति है और भगवान के नाम का सुमिरन भी श्री प्रभु को हृदय में बंधी बना लेता है।

हमको चाहिए कि हम इस तरह शक्ति का आवाह्न करें कि हमारे प्रभु मेरे हैं। शक्ति भगवान के अधीन है, तुम भगवान के अधीन हो जाओ, प्रेम करो तो भगवान की सारी शक्तियां आपको दुलार करने लगेंगी।

"साध्वी आर्या पंडित" 
श्रीमद् भागवत कथा वक्ता,
वृन्दावन, ज़िला - मथुरा - 86501 21385

तब आपको समझ आएगा कि अब तक हम जो मांगते थे वो सब व्यर्थ निकला।


sadhvi Arya Pandit
Sadhvi Arya Pandit


हम सिर्फ सांसारिक सुख ही जानते हैं इसलिए ऐसा होता है। जैसे बालक माता– पिता की गोद में बैठकर खिलौना ही तो मांगेगा, क्योंकि वो उतनी ही बात जानता है, उसकी बुद्धि का विकास नहीं हुआ है।
हम लोग देहाभिमानी जीव है, देहभाव से युक्त हैं। देह भाव में पांच ज्ञानेंद्रियां, पांच कर्मेंद्रियां है तो पूरा का पूरा यंत्र हमारा संसार में ही लगा हुआ है और संसार ही मांगता है। अच्छा देखने को मिले, अच्छा खाने को मिले, अच्छा भोगने को मिले, अच्छा सुनने को मिले, हमारा शरीर सुखी रहे, हमने जिससे संबंध रखें है वो सुखी रहे, इतनी ही भावना है।
सुखी रहने की भावना तो हमारा अधिकार है, पर गलत जगह सुख खोजेंगे तो नहीं मिल पाएगा। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि भगवान ने इस संसार को दुखालय लिखा है और अगर हम यहीं सुख खोजेंगे तो वो नहीं मिल पाएगा।
आज तक सम्पूर्ण सुख किसी को नही मिला। सभी लोग भोग ही रहे हैं लेकिन आज तक क्या मिला, क्या हाथ आया। वही वासना, वही चिंता, वही बल, वही नवीन भोग की चाह।
इसलिए थोड़ा तो बैठ के सोचना चाहिए, कि कुछ होता तो मन कहता न कि इतनी बार भोगा कि अब शांति मिल गई। लेकिन नहीं, जितना भोगो, उतना ही अशांत, जितना भोगो उतना ही खोज और शुरू।
इसका मतलब, दिशा ठीक नही है। दिशा ठीक करो, भगवान के सम्मुख हो, संसार की तरफ मुख करके चलोगे तो अन्त नहीं है। अगर भगवान की तरफ मुख करके चल दिए तो थोड़ी देर तो जलन होगी, जब तक पाप नष्ट नहीं होते।
इसके बाद कदम कदम पर परमानंद है। हृदय शीतल आनंद से भर जाएगा। बार बार प्रभु को प्रणाम करके कहोगे कि प्रभु बचा लिया मुझे।
आप चाहे कामना से युक्त हो, चाहे निष्काम हो, पहले प्रभु की तरफ डट के लगना चाहिए। प्रभु सबके पिता, स्वामी, मालिक, ईश्वर हैं। हमें ईश्वर से कहना चाहिए, की हमे आपका ही ज्ञान है और यही आनंद लगता है और यही मांगेगा भी।
आगे ईश्वर आपका खुद भाव बढ़ाएंगे, तब आपको समझ आएगा कि अब तक हम जो मांगते थे वो सब व्यर्थ निकला।
हम लोग जानते नहीं है इसलिए भोग में लगे हैं, जिस दिन जान जायेंगे, उस दिन इस सांसारिक सुख को खुद फेक देंगे। कहोगे कि, नहीं चाहिए मुझे यह संसार, मुझे तो प्रभु चाहिए।
धीरे धीरे भजन बढ़ाओ, ज्ञान प्रकाशित हो जायेगा तो संसार का महत्व खत्म हो जाएगा। यहां कुछ नही है, जीवन भर लोग यही लगे हैं कि मेरा नाम बड़ा हो जाएगा।
लोग ईश्वर तक का नाम तो ले नहीं रहे हैं तो तुम्हारा नाम कौन लेगा। मर के चले गए सब लेकिन क्या बचा, सब यही पड़ा है।
सीधी बात है धर्मयुक्त आचरण करो, भगवान का भजन करो, भगवान से प्रार्थना करो कि मुझे मार्ग दिखाओ। वो बड़े कृपालु है, ज्ञान रूपी सूर्योदय कर देंगे तो ठीक से चल पाओगे।
"साध्वी आर्या पंडित" 
श्रीमद् भागवत कथा वक्ता,
वृन्दावन, ज़िला - मथुरा - 86501 21385


जीवन में सफलता कैसे प्राप्त करें? "साध्वी आर्या पंडित" श्रीमद् भागवत कथा वक्ता वृन्दावन, ज़िला - मथुरा


Sadhvi Arya Pandit
Sadhvi Arya Pandit


जिंदगी का कोई भरोसा नहीं कि शाम तक जिएंगे की नहीं जिएंगे। जिंदगी में कहां ऊंचे जाओगे, जहां भी ऊंचे जाओगे, पटक दिए जाओगे।

माया का काम है ऊंचे से नीचे पटकना। छोटे बन जाओ, कभी नहीं पटके जाओगे। भजन से क्या होता है, जानते हो? छोटा बना जाता है! अब कोई पटक के दिखाए।

मान लो तुम सीधे चित्त पड़े हो, अब तुम्हें कौन चित्त करेगा क्योंकि तुम पहले ही चित्त हो। अगर तुम्हारी इच्छा है कि कहीं ऊंचे पर चढ़े, तो इसके लिए तुम्हारी पकड़ बहुत अच्छी होनी चाहिए। अगर फिसलोगे तो हड्डी टूट जायेगी। यह ऊंचाई की चाह ही उसको नष्ट कर देती है।

रोज़ भगवान का भजन करते रहो, वो जहां पहुंचा देंगे, वहां से गिरने का कोई चांस नहीं। यही तो माया का खेल है कि वो बड़ा बनाना चाहता है, हर क्षेत्र में बड़ा बनाना चाहता है। यह दोष भी नही है क्योंकि वो बहुत बड़े का बच्चा है! भगवान का बच्चा है और भगवान तो सबसे बड़े हैं इसलिए वो सबसे बड़ा बनना चाहता है।

परंतु इस मार्ग में सबसे बड़ा बना जाता है सबसे छोटा बनकर। जो जितना छोटा बन गया, वो उतना ही बड़ा बन गया। तो सच्ची बात समझो, आप अपने आप को छोटा समझकर काम करो, तो देखना आप सबके पूज्य बन जाओगे।

लेकिन हमारी गलती क्या होती कि हमारे अंदर का अहंकार बड़ा होता है और अहंकार का काम है नाश करना, पतन करना। अहंकार बड़ा कष्टदायक है। हम समझ नही पाते, दुश्मन का साथ देते है और वही हमें मार देता है। छोटा होने से अहंकार नष्ट होता है और जहां अहंकार नष्ट होता है तो वो भगवान की कृपा का पात्र बन जाता है और सर्वमंगल हो जाता है।

भगवान से यह प्रार्थना करो कि आप जैसा भी बनाओ, जो भी बनाओ, अपना बना लो। सबसे बड़ा पद है भगवान का। हम किसके हैं? भगवान के हैं और माया किनकी है भगवान की है।

इसलिए जब आप भगवान से मिलते हो तो माया की चैकिंग बंद हो जाती है, फिर आप चाहे जिनको ले जा सकते हो। संत जनों के पास जो जुड़ते है वो संत जन डब्बा हैं। अगर कनेक्शन हटा दो तो डब्बा चलेगा क्या। इंजन है अचार्य भगवान।

पर इंजन में इतने लोग पार नहीं कर पाते जितने डब्बा में पार हो जाते हैं। इंजन में दो चार लोग बैठते होंगे और डब्बे में सैकड़ों बैठते हैं पर पावर डब्बा में कुछ नहीं है। अगर कनेक्शन इंजन से टूटता है तो वो वहीं खड़ा रह जायेगा।

इंजन है भगवान और हम सब है डब्बा। जब उनसे कनेक्शन है तो पार हो गए और अगर उनसे कनेक्शन हटा, वही खड़े रह जाओगे। अगर हम भगवान से विमुख है तो उसका परिणाम कुछ नही है और अगर हम भगवान के है तो हमारी बहुत बड़ी उन्नति है।

ये जीवन जैसे बना है कटेगा लेकिन हम अंत में भगवान के पास जायेंगे, अपने प्रभु से मिलेंगे। हमारा जन्म मरण छूट जायेगा और सदा सदा के लिए परमानंद हो जाएंगे।

उन्नति इसमें है कि हम भगवान के चरणों का आश्रय लेकर, उन पर भरोसा रखकर कार्य करें, चाहे वो जो भी हो पढ़ाई – लिखाई, नौकरी, व्यापार।

उसमें अगर हम सफल होते है तो श्री जी की जय हो और फेल होते है तो भी श्री जी की जय हो। कोई मंगल विधान होगा श्री जी का, ऐसी भावना से अगर भक्त चलता है तो वो विजय को ही प्राप्त होता है।

तो अगर हम धर्म से चलें तो वास्तविक उन्नति मिलेगी। थोड़ा कष्ट तो हो सकता है पर वो भी हमारे पाप है जिनका नाश हो रहा है।

ऐसा नहीं है कि भगवान हमें वो कष्ट दे रहे हैं। वो हमारे पूर्व के लिए हुए पाप है और जब उनका नाश हो जायेगा तो हमारे वर्तमान में किए हुए पुण्य, सुकृति हमें मंगलमय कर देंगे। इसलिए उन्नति भगवान के चरणों पर समर्पित होने पर है।

"साध्वी आर्या पंडित" 
श्रीमद् भागवत कथा वक्ता,
वृन्दावन, ज़िला - मथुरा - 86501 21385

अगर मन प्रभु के चिंतन में लग गया तो आप बाज़ी जीत गए।


sadhvi arya Pandit
Sadhvi Arya Pandit


जब तक हम मानस पटल पर दर्शन का अभ्यास नहीं करेंगे तब तक कुछ नही होने वाला। हमारा यह मन बहुत चतुर है। दो कार्य एक साथ करने की चेष्टा करता है। जब कि आनंद की अनुभूति होती है कि एक जगह लग जाए। परंतु यह एक जगह लगता कहां है। इसका काम है दो जगह एक साथ लगना।

अगर अपने अंतर मन की वाणी को सुन रहे, देख रहे और लिख रहे तो मन को फुर्सत नहीं मिलेगी और दूसरी चीजों में मन लगेगा नहीं। जब भी मन भागने लगे तो पद गायन, नाम कीर्तन करने लगो और मन को फिर से घसीट के ले आओ। ऐसे जब आप फिर से थोड़ा शांत हो तो फिर आंतरिक जप शुरू कर दो।

हमको एक अभ्यास करना है की चंचल मन अचंचल हो जाए, यह अन्य कहीं और भागे न। आप प्रभु का नाम, प्रभु की लीला में चिपक जाएं। लेकिन ऐसा एक दिन में नहीं होने वाला है। इसके लिए आपको अभ्यास करना पड़ेगा। दीर्घकाल तक सत्कारपूर्वक निरंतर जपा जाए तो मन एक जगह लगना शुरू हो जाएगा।

मान लीजिए अगर आप दस मिनट का समय निकाल कर जप करने बैठे हैं और उसी समय आपका मित्र आकर बात करने लगे तो आपका मन बहुत बुरा मानेगा कि चौबीस घंटे में दस मिनट ही तो जप करता हूं और उसी समय दोस्त आकर बात कर रहा। मतलब मन राज़ी है।

आप देखेंगे कि उस दस मिनट में आकर आपको कोई डिस्टर्ब करने लगे तो आपका मन आपको जलाने लगेगा। अब वही मन, जब दस मिनट के लिए एकाग्र होने लगेगा तो वो संसार की तरफ भागेगा।

जो संसार के बाहरी व्यवहार से जल जाएगा कि मेरे दस मिनट में क्यों विघ्न डाला। वहीं मन उधर भागेगा। अब उसे भागने से रोक लो तो, मन ही बंधन का कारण है और मन ही मोक्ष का कारण है।

अगर मन प्रभु के चिंतन में लग गया तो आप बाज़ी जीत गए। तो अभ्यास में मन कहीं न कहीं मेरा साथ दे रहा है। अब अगर अभ्यास बढ़ाते चले जाएं तो मन पूरा राज़ी भी हो जाएगा।

"साध्वी आर्या पंडित" 
श्रीमद् भागवत कथा वक्ता,
वृन्दावन, ज़िला - मथुरा - 86501 21385

कई ऐसी गलतियां होती हैं जिनको हम समझ नहीं पाते लेकिन अपराध बन जाते हैं।


sadhvi arya pandit
Sadhvi Arya Pandit



ये सभी चीजें होने के कई कारण होते हैं। पूर्व के पाप, वर्तमान का अज्ञात और भगवत विमुखता। प्रभु का आश्रय लेकर भगवत सम्मुख हो जाओ। जो भी व्यापार, नौकरी कर रहे हो वो भगवान का नाम लेकर उनको अर्पित कर दो, यह सेवा भी तो भगवान की है। तभी आपको आनंद मिलने लगेगा।
हम लोग प्रभु से विमुख हो गए हैं, ऐसे आचरण के हो गए कि हमारे वो कर्म जमा है जो हमको भय दिलाते हैं, विषाद दिलाते हैं, दुख दिलाते हैं। हमारे उन जमा कर्मों को भगवान ही खत्म कर सकते हैं।
आगे के कर्मों को हम उनकी कृपा से सुधार सकते हैं। वर्तमान में जो संकट आ रहा है। उसे विवेक के द्वारा हम सह सकते हैं परंतु मिटा नहीं सकते। पूर्व जमा कर्मों को भगवान मिटा देंगें।
आगे कोई गलती न हो वो आप भगवान की कृपा से सावधानी से चलें। अगर कष्ट आया तो विवेक के द्वारा सहो लेकिन यह जो भय विषाद है यह तब तक नहीं मिटेगा जब तक भगवत साक्षात्कार नहीं होगा, भगवत आश्रय नहीं होगा, भगवत भजन नहीं होगा, कुछ भी कर लो, कितना चाहे कमा लो लेकिन कभी विषाद नहीं हटेगा, कभी विश्राम नही मिलेगा, माया की भूख बढ़ती ही चली जाएगी।
भय, शोक, चिंता घेरे ही रहेंगे इसलिए भगवान की शरण में होकर उनकी लीला कथाओं को पढ़ो, सुनो, ठाकुर की सेवा करो उनके आश्रित हो तो सब सही होगा।
हमसे अंजाने में बहुत बड़े बड़े पाप हो जाते है। जैसे घर में लड़की नहीं चाहिए इसके लिए अल्ट्रासाउंड करवा के गर्भ में ही उसको मरवा दिया। यह ऐसा पाप है कि इससे ऐसे रगड़ोगे की कोई बचा नही पाएगा।
भ्रूण हत्या को कुछ माना ही नहीं जा रहा है। यह एक प्रणाली सी मान ली गई है। अगर तुम्हारे आंगन में खेलता हुआ बच्चा तुम्हें आकर थप्पड़ मार दे, कैसा लगेगा तुमको। तुम जल जाओगे, क्रोध में आ जाओगे। ऐसे ही जो तुम्हारे गर्भ में पल रहा है और तुम उसको नष्ट कर दो तो तुम्हें दुख नहीं होता। वो जो पाप आएगा न, तुम्हें नष्ट कर देगा।
तो कई ऐसी गलतियां होती हैं जिनको हम समझ नहीं पाते लेकिन अपराध बन जाते हैं। भगवान की शरण में होकर भजन करो, जिससे हमारे पाप नष्ट हो जाएंगे, नहीं तो जीवन में शांति, सुख, रुपया पैसा से नहीं मिलती, चाहे जितना जमा कर लो। अशांत और क्लेश देता ही रहता है।
किसी के कलावा बांधने से, प्रसाद बाटने से शोक दूर होने वाला नहीं। जब तक तुम्हारे अंदर ज्ञान प्रकट नहीं होगा तब तक ये अज्ञान, माया तुमको रौंदती ही रहेगी। यह जन्म इसलिए ही मिला है कि ज्ञान प्राप्त करो, भगवान की भक्ति करो और पापों से बचो तो आनंद मिल जायेगा।
आजकल पाप से बचने वाला दिमाग है ही नहीं। बस हमको रुपया पैसा मिलना चाहिए, सुख मिलना चाहिए, आनंद मिलना चाहिए लेकिन हमारे कर्म विपरीत हो रहे हैं और फल विपरीत चाह रहे हैं। बबूल लगाओगे तो आम नहीं मिलेगा।
अगर आपके कर्म ठीक हैं, भगवताश्रय है तो फल ठीक है और अगर कर्म खराब हो तो आपको वो फल मिलेगा। इसलिए डरने की जरूरत नहीं है, जितना समय बचा है काम बना लो।
भगवान का आश्रय लेकर भगवान का भजन करो, वो सब ठीक कर देते हैं। वो हर गलती को माफ कर देते हैं। अगर वो कृपालु न हो तो हम लोगो का कभी उद्धार न हो। क्योंकि ऐसे ऐसे पाप बन जाते, आचरण हो जाते हैं जो नही होना चाहिए इसलिए भगवान ही क्षमा कर सकते है। भगवान की तरफ चलो, तो वो क्षमा करके आनंद प्रदान कराएंगे।

 "साध्वी आर्या पंडित" 

श्रीमद् भागवत कथा वक्ता,
वृन्दावन, ज़िला - मथुरा - 86501 21385

रविवार

दूसरों को कैसे विश्वास दिलाएं कि मैं सही मार्ग पर हूं?


arya pandit
Sadhvi Arya Pandit


ऐसा कभी नही हो सकता कि हम सभी को यह विश्वास दिला पाएं कि हम सत्य मार्ग पर चल रहे हैं। हमको अपने हृदय को साक्षी करना है, किसी और को नहीं, कोई और राज़ी हो या न राज़ी हो। इस मार्ग के प्रति ऐसा नहीं होता कि चार लोग बड़ाई करें तभी मार्ग सच्चा है।

यह मार्ग ऐसा नहीं है कि परिवार वाले, गांव वाले, नगर वाले, देश वाले हमारा सपोर्ट करे कि वाह! तुम परमार्थ पर बैठ जाओ घर में। इस तरह परमार्थ पर मत चलना, ऐसे परमार्थ पर नहीं चला जाता।

परमार्थ पर चला जाता है, चाहे सब विरोध करें, हमारे प्राण भी हमारा त्याग कर दें पर आज से हम प्रभु को अपना मानते हैं। हम भजन मार्ग पर चलेंगे, चाहे कुछ भी हो जाए, तब चला जाता है इस मार्ग में।

हमारी आपकी भक्ति कितनी सामर्थशाली है यह प्रभु जाने, लेकिन मीरा जी की भक्ति जगत जानता है कि कितनी सामर्थशाली है। लेकिन उनका देवर ही विश्वास नहीं करता था की इनका मार्ग सत्य है। संतों के बीच बैठने पर लांछन लगाता था, ज़हर दिया, मारने की बहुत प्रकार की चेष्टा की, तो फिर औरों की बात क्या।

हिरणकश्यप इतना तेजस्वी, तपस्वी, शक्तिशाली है और प्रहलाद जी का विरोध कर रहा था, घर घर में विरोध हुआ, देश, नगर, विरोध करे तो यह कौन सी बात है। हर विरोध हमारे मंगल के लिए है क्योंकि हमारा स्वभाव चिपकू है। चित्त वृत्ति जहां आ जाती है जिस व्यक्ति में, जिस विषय में, वहां आशक्त हो जाती है।

भगवान की बड़ी कृपा है कि कोई अपना कहलाने वाला न रहे, कोई हमें प्यार ना करे, सब जगह से हमें दुत्कार मिले तो हम अशरण हो जाएं और अशरण हो गए तो शरणागति प्राप्त हो जाएगी।

तो यह तो भगवान की कृपा है पर यह भाव बिल्कुल गलत है कि कोई हमारा सम्मान करे, सपोर्ट करे, हमारा यश गाए, तो इसमें तो फिर परमार्थ पर चला ही नहीं जा सकता। यह परमार्थ का स्वरूप नही हैं।

हमें चुपचाप आगे बढ़ना है, जो व्यवस्था हमारे ठाकुर जी कर रहे हैं वो हमें चाहिए। अगर हमको गाली मिल रही है, इसका मतलब अभिमान बकाया है तो भगवान उसको भी रौंद देंगे। जब तक अहंकार निर्विष्य नहीं हो जाता, रेत नहीं हो जाता, तब तक भक्ति का रंग नहीं चढ़ता।

कभी कभी भगवान अपने बड़े बड़े भक्तों को भी पिटवा के देखते हैं। जैसे कुम्हार बाजार में अपनी मटकी को पीट कर दिखाता है क्योंकि उसने उसे बनाया है और तपाया है। इसलिए कहता है कि ठोक बजा के देख लो, कितना भी आप पानी डालो, इससे रसेगा नहीं।

ऐसे ही ठाकुर जी, हमारा प्रेमपात्र पक्का हो गया है या नहीं, यह बजा कर दिखा देते हैं। भक्तों ने अपार कष्ट देखा परंतु कदम पीछे नहीं हटाया। तो आज हम उनका यश गाते हैं इसलिए हम लोगों को कमज़ोर नहीं होना चाहिए।

"साध्वी आर्या पंडित" 
श्रीमद् भागवत कथा वक्ता,
वृन्दावन, ज़िला - मथुरा - 86501 21385

भगवान प्रसन्न कैसे होंगे





आपसे पूछा जाए कि आप टीचर क्यों बने, डॉक्टर क्यों नहीं बने। तो जब आप असलियत में देखोगे कि मुझे भगवान ने बना दिया है।

मतलब यह कि आपको भगवान ने बनाया है तो आप भगवान की मान कर सेवा कीजिए। भगवत प्राप्ति में जो एक योगी को भगवत प्राप्ति होती है, वही एक गृहस्थ को भगवत प्राप्ति होती है। पर वह अपने धर्म से चले क्योंकि हम सब भगवान के सेवक हैं, सब को अलग-अलग सेवा विभाग दिया है।

पूरे विश्व में जिसको जो कार्य मिला है उसे भगवान का समझकर सच्चाई से करें तो भगवान प्रसन्न हो जाएंगे क्योंकि भगवान ने ऐसा ही उपदेश किया है। भगवान का स्मरण रहे और आप अपने कर्तव्य को सच्चाई से करें, इसी से भगवान प्रसन्न हो जाएंगे और भगवत प्राप्ति हो जाएगी।

"साध्वी आर्या पंडित" 
श्रीमद् भागवत कथा वक्ता,
वृन्दावन, ज़िला - मथुरा - 86501 21385

कामना, लालच, क्रोध को कैसे नियंत्रित करें?


Sadhvi arya Panddit
Sadhvi Arya Pandit



सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि नियंत्रण किससे होता है। बुद्धि के द्वारा मन पर जो नियंत्रण कर लेता है वही समस्त दुर्वासनाओ पर विजय प्राप्त कर लेता है पर हालत उल्टा हो गए हैं।
विषय ने इन्द्रियों को घसीट लिया है, इन्द्रियों ने मन को अधीन कर लिया है और मन ने बुद्धि को अधीन कर लिया है इसलिए हमारी दुर्गति होती जा रही है।

अब हमें ऐसा विवेक मिले जिससे हमारे बुद्धि में इतनी ऊर्जा आए की वो मन को अधीन कर लें और मन इन्द्रियों को अपने अधीन कर लें, इन्द्रियां निर्विष्य हो जाए तो सभी पाप, दुराचार, मनमानीआचरण सब बंद हो जाए।अब बुद्धि में हमारे ज्ञान कैसे आए, प्रकाश कैसे आए? लेकिन इसके लिए दो बातें हैं। खूब नाम जपते रहें और सत्संग सुने। सत्संग से हमें पता चलता है कि क्या असत्य है और क्या सत्य है। सत्संग से हमारी बुद्धि का मार्जन होता है और नाम से हमें बल मिलता है।

जैसे आप जान गए कि ये नहीं करना चाहिए तो आप और नहीं रुक पाएंगे। सिर्फ जानकारी होने से नहीं रुक पाएंगे। आप में बल चाहिए कि जो नहीं करना चाहिए, उसके लिए अपने मन को रोक सकूं। वो बल मिलता है नाम से।

जितना आप सत्संग सुनेंगे उतना ही प्रकाश आएगा। जिस प्रकार हम प्रकाश में देख सकते हैं लेकिन अंधेरे में पड़ा हुआ रस्सी का टुकड़ा भी सांप नज़र आए तो हम भयभीत हो जाएंगे। लेकिन वहीं प्रकाश हो तो हम देख पाएंगे कि भय की जरूरत नहीं है क्योंकि वो रस्सी है, सांप नहीं।

ऐसे ही अगर यह भ्रम हो कि शरीर के भागों में सुख है, पद प्रतिष्ठा में सुख है तो ये ज्ञान अंधकार में हैं और जब ज्ञान का प्रकाश होगा तो हम देखेंगे कि जहां पर हम सुख देख रहे हैं वहां तो एक बूंद सुख नहीं है।

मरु भूमि में जल का वास कैसे होता है जैसे सूर्य की किरणें पड़ी तो बालू में ऐसा लगता है कि निर्मल जल भरा हुआ है लेकिन वहां एक बूंद पानी नहीं होता। जितना आगे बढ़ते जाओ उतना आगे पानी दिखाई देता है लेकिन होता कुछ भी नहीं।

ऐसे ही मन दिखाता है कि इसमें सुख है, उसमें सुख है, इस पदार्थ में, इस व्यक्ति में सुख है और जब भोगते हैं तो हाथ में कुछ लगता नहीं क्योंकि वहां सुख है ही नहीं। फिर भी हम सुख वहीं खोजते हैं क्योंकि हमारे अंदर अज्ञान है।

इसलिए हमारी बुद्धि को बल मिले, प्रकाश मिले तो हमारी बात बन जायेगी। बल मिलता है हरी नाम से और प्रकाश मिलता है सत्संग से।

सत्संग से विवेक और विवेक से मोह, अंधकार का नाश होता है अर्थात् ज्ञान का प्रकाश होता है और जो व्यक्ति उस पर चल सके, इसका बल मिलता है नाम से।

जब हम हरी नाम जपते हैं तो हमारे अंदर आध्यात्मिक बल आता है। शारीरिक बल कोई बल नहीं है, आध्यात्मिक बल, बल है। तो आध्यात्मिक बल हमारी बुद्धि में नाम से और नाम जप सत्संग से और सत्संग के द्वारा प्राप्त आचारणों के अनुसार हम चलें तो बहुत जल्दी ही हमारे अंदर सुधार हो जायेगा और कामना, लालच, क्रोध को नियंत्रण करना सीख जाएंगे।

"साध्वी आर्या पंडित" 
श्रीमद् भागवत कथा वक्ता,
वृन्दावन, ज़िला - मथुरा - 86501 21385

शनिवार

नौकरी, दुकान, व्यापार करते हुए रखें इन बातों का ध्यान, अवश्य भगवान मिल जाएंगे!

 

Sadhvi Arya Pandit
Sadhvi Arya Pandit



नौकरी, दुकान, व्यापार करते हुए रखें इन बातों का ध्यान, अवश्य भगवान मिल जाएंगे!

हम लोग भजन का मतलब समझते है कि एकांत गुफा में बैठकर किया जाता है या एकांत कमरे में किया जाता है उसे ही भजन कहते हैं। ये भी भजन का एक अंग है लेकिन उसे सांगोपांग भजन नहीं करते हैं। सांगोपांग भजन में पहले ये स्वीकार किया जाता है कि सम्पूर्ण श्रृष्टि श्री भगवान की है।

हम इस श्रृष्टि में भेजे गए हैं अलग अलग सेवाओं के लिए। कोई डॉक्टर है, कोई मास्टर है। विविध प्रकार के अभिनय करके हम को स्वामी से इनाम लेना है। अगर शिक्षक ने भागवत भाव से बालकों को पढ़ाया तो वो भजन ही है।

ऐसे ही एक युद्ध क्षेत्र में खड़ा हुआ सूर्यवीर सामने खड़े सैनिक को मार कर देश की रक्षा करता है, उसका वो भजन ही है और भजन से कम नहीं। क्योंकि वो अपने धर्म के लिए युद्ध में वार कर रहा है।

अधर्म से किया हुआ हर कार्य निष्फल है और धर्म से किया हुआ हर कार्य भजन है क्योंकि ये श्रृष्टि भगवान की है। हमें ये समझना होगा कि हमें जो अभिनय मिला है उसमे बेईमानी न करें। अगर आप सत्यता से चलेंगे, वही आपका भजन बन जाएगा। उसी से भगवान प्रसन्न हो जाएंगे।

लेकिन अगर आप में अपने अभिनय को लेकर अभिमान आ गया तो उपासना की वृत्ति का नाश हो जाना है। इसलिए एक छोटा सा कार्य भी आपको भगवत प्राप्ति करा सकता है। अगर हम सब अपने धर्म से चलें, अपने कर्तव्य को ही भगवान की पूजा मान लें। तो जो जहां है उसको अलग से कोई मार्ग चयन नहीं करना पड़ेगा और उसे वही से भगवान की प्राप्ति होगी।

हमें गुरु का चयन कैसे करना चाहिए और कब करना चाहिए?

 

Sadhvi Arya Pandit
Sadhvi Arya Pandit


हमें पता ही नहीं कि हमारा गुरु कौन है और ये बात पता किसको है, भगवान को। क्योंकि वही गुरु है।

सबसे पहले सबको चाहिए की भगवान को गुरु पद में बैठा लें। श्री कृष्ण, श्री राम, श्री शकंर ही सदगुरु रूप हैं ।

सबसे पहले भगवान को सतगुरु रूप में स्मरण करें, फिर उनसे प्रार्थना करें कि प्रभु प्रकट रूप में हमें आपका सानिध्य चाहिए। अब आप हमें किस रूप में स्वीकार करते हैं, बड़ी शीघ्र कृपा करके हमें वहां पहुंचा दीजिए या आप स्वयं आ जाइए।

विद्यार्थी कभी टीचर को समझ नहीं सकता, ऐसे ही हम संसारी जीव कभी सतगुरु संत की महिमा को नहीं समझ सकते। वो किस स्थित में कहा पहुंचे हुए हैं वो सत्य है या पाखंड है। दोनों बातों का ज्ञान हमें नहीं है तो जिसको ज्ञान है वो भगवान है।

उन्हीं से हम प्रार्थना करें कि आप कृपा करके अपने सद्गुरु रूप में हमें आशक्त कर दीजिए। कहां हो, कैसे हो, हम तो समझ नही पा रहे। या आप आ जाओ या हमें अपने पास बुला लो क्योंकि गुरु भगवान ही है।

अब बात आती है की गुरु का चयन कब करना चाहिए तो जिस दिन हमारे हृदय में बात आ जाए की जीवन का लक्ष्य श्री भगवान को प्रसन्न करना है, उसी दिन गुरु का वरण कर लें। हमारे परमब्रह्म परमात्मा ही हमें गुरु रूप में आकर हम जीव को अज्ञान रूपी दलदल से हटा कर, शुद्ध ज्ञान, शुद्ध प्रेम प्रदान करते हैं।

साध्वी आर्या पंडित" 
श्रीमद् भागवत कथा वक्ता वृन्दावन, ज़िला - मथुरा

शिव और कृष्ण में क्या अंतर है? और इन दोनो में से कौन श्रेष्ठ है?


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 जैसे नेत्र दो हैं लेकिन लक्ष्य एक है और लक्ष्य दो नजर आ रहे हैं तो नेत्र खराब है। अगर श्री कृष्ण और शिव दो नजर आ रहे हैं तो दृष्टि खराब है।

देखने में शिव और कृष्ण दो है लेकिन दोनों का तत्व, दोनों का लक्ष्य एक ही है।

अगर दो नजर आ रहे हैं तो फिर नेत्र खराब है। दोनों एक ही परम सत्य है जैसे दायां और बायां नेत्र मेरे ही हैं और दोनों मेरे है, दिखने में दो हैं लेकिन जो दृश्य दिख रहा है वो एक होगा।

जैसे हम आपको देख रहे हैं और एक ही दिखाई दे रहा है। अगर दो नज़र आ गए तो पता चल जाता है की नेत्र खराब है इसका, ऑपरेशन कराओ। एक उंगली दो नज़र आ रही हैं।

एक मात्र भगवान वासुदेव ही हैं, दूसरा कोई नहीं है।

रूप शिव और रूप श्री कृष्ण और तत्व एक है ।

मंगलवार

भारत में भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग कहां-कहां हैं? मनुष्य जीवन में एक बार जरूर करें दर्शन।

भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग हमारे देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थापित हैं। हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार, इन 12 ज्योतिर्लिंग पर भगवान शिव स्वयं विराजमान हैं।

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ऐसा कहा जाता है कि जो व्यक्ति जीवन में एक बार इन ज्योतिर्लिंगों के दर्शन कर लेता है, उसके सात जन्मों के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। आइए जानते हैं कि भगवान शिव के ये 12 ज्योतिर्लिंग हमारे देश में कहां कंहा स्थित हैं।

1. सोमनाथ ज्योतिर्लिंग- 

 सोमनाथ ज्योतिर्लिंग


यह भारत का सबसे प्रसिद्ध और बड़ा ज्योतिर्लिंग है। यह गुजरात मे स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग को 16 बार तोड़ा गया है और फिर बनाया गया है। ऐसा कहा जाता है चंद्र ने राजा दक्ष की सभी 27 बेटियों के साथ विवाह किया था। लेकिन प्रेम वे सिर्फ रोहिणी से ही करते थे। इसके चलते दक्ष की बाकी बेटियां हमेशा मायूस और उदास रहती थीं।

एक दिन राजा दक्ष का सब्र का बांध टूट गया और उन्होंने चंद्र को श्राप दिया कि वे अपनी सारी चमक खो देंगे। इस श्राप के असर से चंद्र ने अपनी रोशनी खो दी और पूरा संसार अंधकार में डूब गया। परिस्तिथियां बिगड़ते देख, सभी देवताओं ने दक्ष से आव्हान किया कि वो चंद्र को माफ कर दें।

काफी प्रयासों के बाद दक्ष ने कहा अगर चंद्र भगवान शिव की कठोर तपस्या करेंगे तो उनको अपना प्रकाश पुनः वापस हासिल हो जाएगा। इस के तुरंत बाद चंद्र ने घोर तपस्या की जिसके चलते भोलेनाथ प्रसन्न हुए और उन्होंने चंद्र को उसका प्रकाश वापस लौटा दिया। यहीं से स्थापना हुई पहले ज्योतिर्लिंग सोमनाथ की।

2. महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग- 

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महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग


यह भारत का दूसरा प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग है। ये ज्योतिर्लिंग उजैन के रुद्र सागर झील के पास बना हुआ है। ऐसी मान्यता है कि यहां कभी चंद्रसेन नाम के राजा का शासन हुआ करता था। वो भगवान शिव का बहुत बड़ा भक्त था और वहां की प्रजा भी महादेव को पूजती थी। एक बार राजा रिपुदमन ने चंद्रसेन के महल पर हमला बोल दिया। उसके साथ मायावी राक्षस दूषण भी था जो कभी अदृश्य हो सकता था।

राक्षस ने वहां की प्रजा को प्रताड़ित किया और पूरे महल को बर्बाद कर दिया। तब वहां की प्रजा ने भगवान शिव को याद किया और मदद की गुहार लगाई। ऐसा कहा जाता है कि यहां महादेव ने स्वयं दर्शन दिए और प्रजा की रक्षा की इसके बाद उज्जैन के लोगों की प्रार्थना सुनकर भोलेनाथ ने निर्णय किया कि वे उज्जैन नहीं छोड़ेंगे. इस प्रकार से उत्पन्न हुआ महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग।

3. ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग- 



ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग

यह मध्यप्रदेश में स्थित है। ये ज्योतिर्लिंग नर्मदा नदी के पास शिवपुरी द्वीप पर बना है। ओंकारेश्वर का अर्थ होता है ओंकारेश्वर का भगवान। पुराणों के मुताबिक, यहां एक बार देवताओं और असुरों के बीच बड़ा युद्ध हुआ जिसमें असुरों ने देवताओं को परास्त कर दिया। 

इसके बाद सभी ने भगवान भोलेनाथ से प्रार्थना की कि वो आएं और उनकी रक्षा करें। देवताओं की गुहार स्वीकार करते हुए भगवान शिव वहां आए और उन्होंने उन राक्षसों का संहार किया। इस प्रकार से वहां ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना हुई।

4. वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग- 


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वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग

यह झारखंड में स्थित है ऐसी मान्यता है कि यहां पूजा करने से आपके सभी कष्टों का निवारण हो जाता है। इस ज्योतिर्लिंग की कहानी महान पंडित और राक्षस रावण से जुड़ी हुई है। ऐसा कहा जाता है कि एक बार दशानन हिमालय पर भगवान की बहुत कठोर तपस्या कर रहा था। वो अपने सभी सिर एक-एक करके भगवान शिव को अर्पित कर रहा था। जैसे ही वो अपना नौवा सिर भेंट कर रहा था, तभी महादेव प्रकट हुए और रावण से कोई भी वरदान मांगने को कहा। तब रावण ने कहा कि वो चाहता है कि वो उसके साथ लंका नगरी चलें और वहां जाकर स्थापित हो जाएं।

अब भोलेनाथ ने रावण की ये प्राथना स्वीकार की लेकिन साथ में ये शर्त भी रख दी की अगर ये शिवलिंग उसने बीच रास्ते में कहीं भी जमीन पर रख दिया तो वो हमेशा के लिए वहीं स्थापित हो जाएंगे। रावण ने ये शर्त स्वीकार की और ज्योतिर्लिंग लेकर लंका की ओर चल दिया। भगवान शिव के इस निर्णय से देवता बहुत दुखी और चिंतित थे, क्योंकि वे भोलेनाथ को लंका जाते हुए नहीं देख सकते थे।

फिर सभी देवता विष्णु के पास गए और उनसे समाधान निकालने की गुहार लगाई। तब विष्णु ने ऐसी लीला रची की रावण बीच रास्ते में शिवलिंग एक ग्वाले को सौंपकर चला गया। परंतु उस ग्वाले ने उस शिवलिंग को वहीं जमीन पर रख दिया और शर्त अनुसार वो ज्योतिर्लिंग वहीं स्थापित हो गया। कहते हैं उस ग्वाले के रूप स्वंय भगवान विष्णु आए थे ये लीला रचने के लिए।

5. भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग-



भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग

 भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग की इतिहास में बहुत मान्यता है. ये ज्योतिर्लिंग पुणे के शहाद्रि इलाके में स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग की कहानी कुंभकरण के पुत्र भीमा से जुड़ी है. ऐसा कहा जाता है कि जब भीमा को ये पता चला कि उसके पिता को मौत के घाट भगवान विष्णु ने राम के अवतार में उतारा है, वो उस बात से बहुत क्रोधित हुआ और उसने बदला लेने की ठानी।

तब उसने खुद पर खूब अत्याचार किए और कठोर तप किया जिसके चलते ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए और उसे उसकी इच्छा अनुसार काफी सारी दिव्य शक्तियां प्रदान की. वरदान प्राप्ति के तुरंत बाद भीमा ने पूरी धरती का सर्वनाश करना शुरू कर दिया उसने भगवान शिव के परमभक्त से भी युद्ध किया और उसे कैद कर लिया
। धरती पर ये अत्याचार देख सभी देवता काफी परेशान और विचलित हो गए। उन्होंने भगवान शिव से प्रार्थना की कि वे इस राक्षस का संहार करें।

तब महादेव और भीमा के बीच में भीषण युद्ध हुआ और महादेव ने उसे धूल चटा दी. तब सभी देवतागण के आग्रह पर वे वहीं रह गए और इस तरह भोलेनाथ को नया नाम- भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग मिल गया. मान्यता तो ये भी है कि जो पसीना भगवान शिव का युद्ध के समय जमीन पर गिरा था उसी की वजह से वहां भीम नदी उत्पन्न हुई
।

6. घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग- 


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घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के औरंगाबाद में स्थित है. इसका निर्माण अहिल्याबाई होलकर ने करवाया था. ऐसा कहा जाता है कि इस ज्योतिर्लिंग के तार एक विवाहित जोड़े से जुड़े हैं. ये कहानी है सुर्धम और सुदेशा की. इस विवाह में सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था।

बस दुख इस बात का था कि उनकी कोई संतान नहीं थी. तब सुदेशा ने निर्णय किया कि सुर्धम की शादी उसकी बहन घूश्म से करवा दी जाए. दोनों के शादी होते ही उनको एक प्रतिभावाहन बालक हुआ। लेकिन सुदेशा को ये बात खटकने लगी और उसने मौका मिलते ही उस बालक को झील में फेक दिया जहां सुर्धम ने 101 शिवलिंग अर्पित किए थे. ये समाचार मिलते ही सुर्धम ने झील के पास जाकर भोलेनाथ को याद किया और अपने बालक को वापस पाने की गुहार लगाई
।

कहते हैं महादेव ने उनकी पुकार सुनी और सुर्धम को उसका बच्चा भी लौटा दिया
। सिर्फ यही नहीं सुर्धम ने सुदेशा के लिए भी माफी मांगी और भोलेनाथ से उसे माफ करने को कहा। ये देख भोलेनाथ बहुत प्रसन्न हो गए और उन्होंने सुर्धम को आर्शीवाद दिया. उसी स्थान पर भगवान शिव घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हो गए।

7. नागेश्वर ज्योतिर्लिंग-

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग


कृष्ण नगरी द्वारका में स्थित है नागेश्वर ज्योतिर्लिंग
। ऐसी मान्यता है कि ये ज्योतिर्लिंग सभी प्रकार के जहर के प्रभाव से सुरक्षित है। ये ज्योतिर्लिंग भी एक भक्त की कृपा से ही द्वारका में स्थापित हुआ. एक बार दारुका नाम के राक्षस ने शिवभक्त सुप्रिया को अपने कब्जे में ले लिया। उसके साथ उस राक्षस ने और भी बहुत सी महिलाओं को बंदीगृह में रखा था।

तब सुप्रिया ने सबसे कहा कि वो ओम नमः शिवाय का जाप करें. जैसे ही दारुका को इस बात की भनक लगी, वो सुप्रिया को मारने के लिए निकल पड़ा. लेकिन तभी महादेव प्रकट हुए और उन्होंने उस दुष्ट राक्षस का संहार किया। इस प्रकार द्वारका की धरती पर नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना हुई
।

8. त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग- 



त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग

नासिक में स्थित त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की बहुत मान्यता है. ऐसा कहा जाता है कि गोदावरी नदी का अस्तित्व भी इस ज्योतिर्लिंग के वजह से हुआ है। शिव पुराण के अनुसार, एक बहुत ही प्रसिद्ध गौतम ऋिषि हुआ करते थे। उनको भगवान वरुण से ये वरदान मिला था कि उनके पास कभी भी अनाज की कमी नहीं होगी।

लेकिन दूसरे देवताओं को इस बात से जलन होने लगी तो उन्होंने एक गाय को उनके अनाज के ऊपर छोड़ दिया. उस गाय को देख ऋषि ने उस गाय को मार दिया. उनको बाद में इस बात का दुख हुआ और उन्होंने भगवान शिव की अराधना की। तब महादेव ने गंगा देवी को कहा की वे ऋषि के इलाके से होकर निकलें, जिससे उनके सभी पाप धुल जाएं. इस प्रकार से वे नासिक में त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हो गए।

9. काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग-
 
काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग


वाराणासी की घाटों पर गंगा के पास स्थित ये एक विश्व प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग है। ऐसा कहा जाता है कि जो भी व्यक्ति अपने जीवन की आखिरी सांस यहां लेता है उसे सीधे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस ज्योतिर्लिंग के विषय में एक नहीं बल्कि अनेक कथाएं चर्चा का केंद्र है।

सबसे चर्चित कथा है ब्रह्मा जी और विष्णु के बीच हुए मतभेद की. ऐसा कहा जाता है कि एक बार ब्रह्मा जी और विष्णु जी में इस बात पर बहस हो गई कि कौन ज्यादा बड़ा है। तब ब्रह्मा जी अपने वाहन पर निकल कर स्तम्भ का ऊपरी भाग खोजने लगे। वहीं विष्णु जी चले गए निचला भाग खोजने के लिए. तभी उस स्तम्भ में से प्रकाश निकला और महादेव प्रकट हुए
।

अब भगवान विष्णु तो अपने कार्य में असफल रहे, लेकिन ब्रह्मा जी ने झूठ बोला कि उन्होंने ऊपरी छोर खोज लिया
। इस बात से भगवान शिव काफी क्रोधित हो गए और उन्होंने ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि अब उन्हें कोई नहीं पूजेगा। ऐसा कहा जाता है कि महादेव स्वयं वहां काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हो गए।

10. केदारनाथ ज्योतिर्लिंग- 

kedarnath jyotirling
 केदारनाथ ज्योतिर्लिंग


केदारनाथ चारों धाम में सबसे प्रमुख धाम माना जाता है. उस पवित्र धाम में केदारनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना हुई थी. भगवान शिव केदारनाथ में सदैव निवास करते हैं और जो भी वहां जाता है उसकी सभी मनोकामना पूरी होती है। इस ज्योतिर्लिंग के सिलसिले में एक कथा काफी चर्चित है।

ऐसा कहा जाता है भगवान ब्रह्मा के दो पुत्र थे नर और नरायरण. इन दोनों ने द्वापर युग में कृष्ण और अर्जुन के रूप में जन्म लिया था. नर और नारायण भगवान भोलेनाथ के बड़े भक्त थे
। इसलिए उन्होंने बद्रीनाथ में एक स्वयं का शिवलिंग बनाया था और उसके सामने बैठकर दोनों घोर तपस्या करते थे. ऐसा कहा जाता है उस शिवलिंग पर रोज भगवान शिव दर्शन दिया करते थे।

एक दिन भोलेनाथ उन दोनों बालकों से इतने प्रसन्न हो गए कि उन्होंने दोनों से कहा कि वो कोई वरदान मांगे. तब दोनों ने कहा कि आप बस इस स्थान पर सदैव के लिए बस जाएं. भगवान शिव ने उनकी इच्छा पूरी की और इस तरह केदारनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना हुई
।


11. मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग-

mallikarjuna jyotirlinga
मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग


मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग आंध्र प्रदेश में स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग की कहानी इस प्रकार है- प्राचीन काल में बताया जाता है कि एक बार माता पार्वती और भगवान शिव भी दुविधा में फस गए थे। दोनों इस बात का निर्णय ही नहीं कर पा रहें थे कि पहले शादी गणेश की हो या कार्तिकेय की?

फिर दोनों ने मिलकर एक प्रतियोगिता आयोजित की। प्रतियोगिता के अनुसार, गणेश और कार्तिकेय में से जो भी सबसे जल्दी संपूर्ण धरती का चक्कर लगाएगा उसकी शादी पहले की जाएगी। इसके बाद कार्तिकेय अपने मोर पर निकल पड़े भ्रमण के लिए, वहीं गणेश ने माता पार्वती और शिव के इर्द-गिर्द एक चक्कर लगा लिया।

पूछे जाने पर गणेश ने बोला कि उनके लिए उनके माता पिता ही संसार हैं। इसलिए उन्होंने उनका चक्कर लगा लिया। ये सुन माता पार्वती और भगवान शिव इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने गणेश का विवाह विश्वरूपम की दोनों बेटियां रिधि और सिद्धि से करवा दिया।

ये देख कार्तिकेय को बहुत बुरा लगा और उन्होंने निर्णय किया कि वो कभी शादी नहीं करेंगे। इसके बाद वे श्री सैला पहाड़ की तरफ निकल पड़े और अपनी आगे की जिंदगी वहीं बिताई। जब माता पार्वती और शिव को इसके बारे में जानकारी मिली तो वो दोनों उनसे मिलने पहुंच गए। माता पार्वती उनसे पूर्णिमा के दिन मिली। वहीं भगवान शिव उनसे अमावस्या के दिन मिलने पहुंचे। इस तरह मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की स्थापना हुई।

12. रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग- 

rameshwaram jyotirling
रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग


सबसे ज्यादा प्रसिद्ध और चर्चित ज्योतिर्लिंग है रामेश्वरम. तमिलनाडु में स्थित इस ज्योतिर्लिंग को रामायण से जोड़कर देखा जाता है। भगवान राम जब माता सीता की खोज करते हुए रामेश्वरम पहुंचे, तब वहां थोड़ी देर विश्राम के लिए रुक गए। वहां जैसे ही वो जल पीने के लिए नदी के पास गए,उन्हें रोक दिया गया और एक आकाशवाणी हुई जिसमें कहा गया कि वो जल उनकी इजाजत के बिना नहीं पी सकते।

इसके बाद भगवान राम ने मिट्टी से एक शिवलिंग का निर्माण किया और उसकी पूजा अर्चना की। उनकी पूजा से प्रसन्न हो कर भोलेनाथ ने अपने दर्शन दिए और राम ने उनसे विजय होने का आशीर्वाद मांगा जिससे वे अंहकारी रावण का वध कर सके। भगवान शिव ने उन्हें आशीर्वाद दिया और स्वयं वहां रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हो गए।

आंवला क्या है? आंवला के फायदे

आंवला एक ऐसा फल है, जिसके अनगिनत लाभ हैं। आंवला ना सिर्फ त्वचा, और बालों के लिए फायदेमंद है, बल्कि कई तरह के रोगों के लिए औषधि के रूप में भी काम करता है। आंवला का प्रयोग कई तरह से किया जाता है, जैसे- आमला जूस, आंवला पाउडर, आंवला अचार आदि। आंवला में प्रचुर मात्रा में विटामिन, मिनरल, और न्यूट्रिएन्ट्स होते हैं, जो आंवला को अनमोल गुणों वाला बनाते हैं।

आंवला क्या है? 
आंवला को आयुर्वेद में अमृतफल कहा गया है। वैदिक काल से ही आंवला का प्रयोग औषधि के रूप में किया जा रहा है।

पेड़-पौधे से जो औषधि बनती है उसको काष्ठौषधि कहते हैं और धातु-खनिज से जो औषधि बनती है उनको रसौषधि कहते हैं। इन दोनों तरह की औषधि में आंवला का इस्तेमाल किया जाता है। यहां तक कि आंवला को रसायन द्रव्यों में सबसे अच्छा माना जाता है यानि कहने का मतलब ये है कि जब बाल बेजान और रूखे-सूखे हो जाते हैं तब आंवला का प्रयोग करने पर बालों में एक नई जान आ जाती है। आंवला का पेस्ट लगाने पर रूखे बाल काले, घने और चमकदार नजर आने लगाते हैं।

चरक संहिता में आयु बढ़ाने, बुखार कम करने, खांसी ठीक करने और कुष्ठ रोग का नाश करने वाली औषधि के लिए आंवला का उल्लेख मिलता है। इसी तरह सुश्रुत संहिता में आंवला के औषधीय गुणों के बारे में बताया गया है. आंवला वह औषधि है, जो शरीर के दोष को मल के द्वारा बाहर निकालने में मदद करता है। पाचन संबंधित रोगों और पीलिया के लिए आंवला का उपयोग किया जाता है। इसे कई जगहों पर अमला नाम से भी जाना जाता है।

आंवला के फायदे आंवला के प्रयोग से अनगिनत फायदे होते हैं। आंवला खून को साफ करता है, दस्त, मधुमेह, जलन की परेशानी में लाभ पहुंचाता है। इसके साथ ही यह जॉन्डिस, हाइपर-एसिडिटी, एनीमिया, रक्तपित्त (नाक-कान से खून बहने की समस्या), वात-पित्त के साथ-साथ बवासीर या हेमोराइड में भी फायदेमंद होता है। यह मल त्याग करने की प्रक्रिया को आसान बनाता है। यह सांसों की बीमारी, खांसी और कफ संबंधी रोगों से राहत दिलाने में सहायता करता है। अमला आंखों की रोशनी को भी बेहतर करता है। अम्लीय गुण होने के कारण यह गठिया में भी लाभ पहुंचाता है।

आंवला शरीर के पित्त, वात और कफ को संतुलित करने में मदद करता है। आंवला, पीपल और हरड़, सभी तरह के बुखार से राहत दिलाने में सहायता करता है। यह दर्द निवारक दवा के रूप में भी काम करता है।

बालों की समस्या में आंवले के फायदे
सफेद बालों की समस्या से हर उम्र के लोग जूझ रहे हैं। आंवला के मिश्रण का लेप लगाने से कुछ ही दिनों में बाल काले हो जाते हैं। 30 ग्राम सूखे आंवला, 10 ग्राम बहेड़ा, 50 ग्राम आम की गुठली की गिरी और 10 ग्राम लौह भस्म लें। इन्हें रात भर लोहे की कढ़ाई में भिगोकर रखें। अगर कम उम्र में बाल सफेद हो रहे हैं तो इस लेप को रोज लगाएं। कुछ ही दिनों में बाल काले होने लगते हैं।

मोतियाबिंद में अमला के फायदे
आमतौर पर उम्र के बढ़ने के साथ कई लोगों को मोतियाबिंद की परेशानी होने लगती है। इससे बचने के लिए आंवला के साथ रसांजन, मधु और घी मिला लें। इस मिश्रण को आंखों में लगाने से आंखों के पीलेपन और मोतियाबिंद में फायदा मिलता है।

आंखों की बीमारी में आंवला के फायदे
आंवले के 1-2 बूंद रस को आंखों में डालने से आंखों के दर्द से राहत मिलती है।
आंवले के बीज को घिसकर आंखों में लगाने से आंखों के रोग में फायदा पहुंचता है।
अपांप्म, आंवले का रस, धाय के फूल, नीलाथोथा तथा खपरिया तुत्थ को नींबू के रस से मिला लें। इसकी गोली बनाकर आंखों में काजल की तरह लगाने से आंखों के अनेक रोग ठीक होते हैं।
7 ग्राम आंवले को जौ के साथ कुटकर ठंडे पानी में भिगो लें। दो-तीन घंटे बाद आंवलों को निचोड़ कर निकाल लें। इसी पानी में फिर से दूसरे आंवला को ऐसे ही भिगो दें। दो-तीन घंटे बाद फिर निचोड़ कर निकाल लें। इस तरह तीन-चार बार करें। इस पानी को आंखों में डालने से आँखों की सूजन कम  होती है।
आंवले के पत्ते और फल का मिश्रण आंखों में लगाएं। इससे आंख आने की परेशानी से राहत मिलती है।
आंवले को पीसकर पेस्ट बना लें, और उसकी पोटली बनाकर आंखों पर बांधें। इससे पित्त दोष के कारण होने वाली आंखों की खुजली, जलन आदि की परेशानी में लाभ मिलता है।

नाक से खून बहने की समस्या में फायदेमंद आंवला
नाक से खून बहने की समस्या अनेक कारणों से हो सकती है। इसमें आंवला फायदेमंद होता है। जामुन, आम तथा आंवले को कांजी आदि के साथ बारीक पीस लें। इसे मस्तक पर लेप करने से नकसीर (नाक से खून बहने की समस्या) में लाभ होता है।

गले की खराश में आंवला के फायदे
जब भी मौसम बदलता है तो आमतौर पर गले में खराश की परेशानी होने लगती है। ऐसे में आमला चूर्ण काफी फायदेमंद है। अजमोदा, हल्दी, आंवला, यवक्षार तथा चित्रक को समान मात्रा में मिला लें। 1 से 2 ग्राम आमला चूर्ण को 2 चम्मच मधु तथा 1 चम्मच घी के साथ चाटें। इससे गले की खराश दूर होती है।

अपच में लाभकारी आंवला
कई बार असमय खाने या कुछ भी गलत खा लेने पर अपच या इंडाइजेशन हो जाता है। इसके लिए आंवला को पका लें। इसमें उचित मात्रा में काली मिर्च, सोंठ, सेंधा नमक, भूना जीरा और हींग मिला लें। इसे छाया में सुखाकर सेवन करने से भूख लगती है, तथा कब्ज और अपच जैसी समस्याओं से राहत मिलती है।

अपच में करिश्माई के फायदे

आईबीएस (संग्रहणी) रोग से दिलाये राहत आंवला
संग्रहणी रोग में बार-बार दस्त होता है। ये अक्सर खान-पान में बदलाव होने पर होता है। मेथी-दाना के साथ आंवले के पत्तों को मिलाकर काढ़ा बना लें। दिन में दो बार 10 से 20 मिली पीने से संग्रहणी रोग में लाभ होता है।

कब्ज में आंवला के फायदे
आजकल की जीवनशैली या खान-पान की वजह से सभी लोग कब्ज से परेशान रहते हैं। 3-6 ग्राम त्रिफला चूर्ण को गुनगुने जल के साथ सेवन करें। इससे कब्ज में लाभ मिलता है।

दस्त में आंवला के फायदे
10-12 ग्राम आंवले के कोमल पत्तों को पीसकर, छाछ के साथ रोज सुबह-शाम सेवन करें। इससे दस्त में लाभ होता है।

प्रवाहिका में आंवला के फायदे
मल के साथ खून आने लगता है तो यह स्थिति शरीर के लिए गंभीर हो जाती है। 10-20 मिली आंवले के रस में 10 ग्राम शहद और 5 ग्राम घी मिला लें। इसे पिएं, और इसके बाद 100 मिली बकरी का दूध पी लें। ऐसा दिन में तीन बार करें। पेचिश में लाभ होता है।

उल्टी से दिलाये राहत आंवला
10-20 मिली आंवला के रस में 5-10 ग्राम मिश्री मिलाकर सेवन करें। इससे हिचकी और उल्टी बंद हो जाती है।

5-10 ग्राम आंवला के चूर्ण को पानी के साथ पीने से भी उल्टी में फायदा होता है।

एसिडिटी में आंवला या अमला के फायदे
अम्लपित्त या हाइपरएसिडिटी आजकल आम समस्या बन गई है। बच्चों से लेकर बूढ़े, किसी को भी यह समस्या हो सकती है। आंवले के 10 ग्राम बीजों को रात भर जल में भिगोकर रखें। अगले दिन गाय के दूध में बीजों को पीस लें। इसे 250 मिली गाय के दूध के साथ सेवन करें। इससे एसिडिटी में लाभ होता है।

बवासीर में आंवला के लाभ
अर्श यानि बवासीर कब्ज के कारण होने वाली बीमारी है। अक्सर जो लोग मसालेदार खाना खाते हैं उनको ये समस्या होती है। इसके लिए आंवला का उपयोग लाभ पहुंचाता है।

–आँवलों को अच्छी तरह पीसकर एक मिट्टी के बरतन में (अन्दर की तरफ) लेप कर देना चाहिए। रोगी को इस बरतन में छाछ रखकर पीना चाहिए। इससे बवासीर में लाभ होता है

-बवासीर में अधिक रक्तस्राव होता हो तो 3-8 ग्राम आंवला चूर्ण को दही की मलाई के साथ सेवन करें। ऐसा दिन में दो-तीन बार करें।

प्रमेह (डायबिटीज) में आंवला या अमला के फायदे
प्रमेह को डायबिटीज या मधुमेह भी कहते हैं। वर्तमान में डायबिटीज से अनेक लोग ग्रस्त हैं। इसके लिए आंवला, हरड़, बहेड़ा, नागरमोथा, दारुहल्दी एवं देवदारु लें। इनको समान मात्रा में लेकर पाउडर बना लें। इसे 10-20 मिली की मात्रा में सुबह-शाम डायबिटीज के रोगी को पिलाने से लाभ मिलता है।

खुजली से दिलाये राहत आंवला
आंवले की गुठली को जलाकर भस्म बना लें। इसमें नारियल तेल मिला ले। इसे गीली या सूखी किसी भी प्रकार की खुजली पर लगाने से लाभ होता है।

त्वचा रोग में फायदेमंद आंवला
नीम का पत्ता तथा आंवले को घी के साथ सेवन करें। इससे फोड़े, चोट संबंधी परेशानी, पित्त की समस्या, खुजली आदि में लाभ होता है। [


पीलिया में लाभकारी आंवला
कामला को पीलिया भी कहते हैं। पीलिया होने पर त्वचा का रंग पीला हो जाता है और शुरुआती स्थिति में इलाज नहीं होने पर यह गंभीर हो सकता है।

–आंवले की चटनी बनाकर उसमें शहद मिला लें। इसका सेवन करने से लिवर विकार और पीलिया में लाभ होता है।

-125-250 मिग्रा लौह भस्म के साथ 1-2 नग आंवले के चूर्ण का सेवन करने से पीलिया और एनीमिया में लाभ होता है।


कुष्ठ रोग में आंवला के फायदे
आंवला और नीम के पत्ते को समान मात्रा में लेकर महीन चूर्ण बना लें। इसकी 2 से 6 ग्राम या 10 ग्राम तक रोज सबुह शहद के साथ चाटें। इससे कुष्ठ की गंभीर बीमारी में भी तुरंत लाभ होता है।

धातु रोग में आंवला के फायदे
आंवले के गुठली रहित 10 ग्राम चूर्ण को धूप में सुखा लें। इसमें दोगुनी मिश्री मिला लें। इसे ताजे जल के साथ 15 दिन तक लगातार सेवन करें। इससे स्वप्नदोष, शुक्रमेह आदि रोगों में निश्चित रूप से लाभ मिलता है। 

सुजाक में आंवला के फायदे
सुजाक या गोनोरिया यौन संक्रमित रोग (एसटीडी) है। इस बीमारी में लिंग के अंदर घाव हो जाता है जिससे पस निकलता है। इसके लिए 2-5 ग्राम आंवला के चूर्ण को एक गिलास जल में मिला लें। इसे पिलाएं, और इसी जल से लिंग को धोएं। इससे सूजन और जलन शान्त होती है। इससे धीरे-धीरे घाव ठीक होता है और पीव आना बन्द हो जाता है।

गठिया के दर्द से दिलाये राहत आंवला
गठिया में जोड़ों में दर्द और सूजन हो जाता है। इस परेशानी से सबसे ज्यादा बड़े-बूढ़े ग्रस्त होते हैं। इसमें 20 ग्राम सूखे आंवले और 20 ग्राम गुड़ लें। इसे 500 मिली पानी में उबाल लें। 250 मिली पानी शेष रहने पर छानकर सुबह शाम पिएं। इससे गठिया में लाभ होता है। इस दौरान नमक का सेवन ना करें।

बुखार में आंवला के फायदे
मोथा, इद्रजौ, हरड, बहेड़ा, आंवला, कुटकी तथा फालसा का काढ़ा बना लें। इसे 10-30 मिली मात्रा में पिएं। इससे कफ दोष के कारण होने वाले बुखार में लाभ होता है।

हिचकी से आराम दिलाये आंवला
हिचकी की परेशानी को ठीक करने के लिए पीपल, आंवला तथा सोंठ के 2-2 ग्राम चूर्ण में 10 ग्राम खांड तथा 1 चम्मच मधु मिला लें। इसे थोड़ी-थोड़ी देर में चाटने से हिचकी तथा दमा में लाभ होता है।

10-20 मिली आंवला रस तथा 2-3 ग्राम पीपल के पत्ते के चूर्ण में 2 चम्मच शहद मिला लें। दिन में दो बार सेवन करने से हिचकी में लाभ होता है।

गले में खराश के लिए आंवला के फायदे
गले में खराश होने पर आंवले का उपयोग आपको फायदा पंहुचा सकता है।आंवला में लवण रस को छोड़ कर सभी पांच रस (मधुर-अम्ल -कटु -तिक्त -कषाय) होते है। अतः इसके मधुर और कषाय रस के कारण ये गले की खराश को कम करने में सहायता करता है। अगर गले में खराश सूजन के कारण है तो इसका शीत गुण और मधुर शोथ या सूजन को कम कर गले को आराम देता है।




बढ़ती उम्र के प्रभाव को रोकने के लिए आमला के फायदे

बढ़ती उम्र के प्रभाव को आंवला के सेवन के रोका जा सकता है। आयुर्वेद के अनुसार आंवला को रसायन माना गया है। यहाँ पर रसायन को मतलब जिसके सेवन से शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है। रसायन के सेवन से शरीर में होने वाले डिजेनरेटिव को रोकने में सहायता मिलती है जिससे बढ़ती उम्र के लक्षण कम होने लगते है।

हड्डियों को मज़बूत बनाने में आमला के फायदे
आंवला रसायन होने के के कारण सभी शरीर की सभी धातुओं को पोषण देता है। अतः यह अस्थि धातु को भी पोषण देकर हड्डियों को मजबूती प्रदान करता है।

खून साफ करने में आमला फायदेमंद
आंवला का सेवन खून को साफ करने में सहायता करता है। अतः आंवला जूस खून के अशुद्ध से होने वाले रोगों से राहत दिलाने में फायदेमंद होता है।

कैंसर से बचने के लिए आंवले का उपयोग
आंवले का सेवन कैंसर को फैलने रोकने में भी सहायक होता है, क्योंकि इसमें कैंसर रोधी तत्व पाये जाते हैं। आयुर्वेद के अनुसार भी आंवला रसायन होता है यानि रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाने बढ़ाता है अतः ये कैंसर को रोकने में मदद करता है।

दिमाग को तेज़ करने में आंवले का उपयोग
आंवला का उपयोग दिमाग की क्रियाशीलता बढ़ाने में सहायक होता है। आंवला में पाये जाने वाला रसायन गुण दिमाग को तेज करने में मदद करता हैं।

दांतों के लिए आंवला का उपयोग
आंवला की पत्तियां और फल दोनों ही मुँह से संबंधित रोगों में फ़ायदेमंद होते है। आंवला की पत्तियों का प्रयोग दांतो की मजबूती के लिए किया जाता है साथ हि फल का प्रयोग मसूड़ो यानि गम्स से संवंधी रोगों में फायदेमंद होता है।

हृदय को स्वस्थ रखने में आंवले के फायदे
आंवला का सेवन हृदय को स्वस्थ रखने में सहायक होता है, क्योंकि आंवले का सेवन कोलेस्ट्रॉल को कम करने में सहायता करता है साथ ही आंवले में पाये जाने वाला विटामिन-सी रक्तवाहिनी को संकुचित होने से रोकता जिसे रक्त का दबाब भी सामान्य रहता है।


नसों की कमज़ोरी दूर करने में आंवले का उपयोग
आंवले का उपयोग नसों की कमज़ोरी दूर करने में सहायक होता है, क्योंकि आँवले में रसायन का गुण पाया जाता है। रसायन का गुण नसों में समय साथ हो रहे परिवर्तनों यानि डिजेनरेटिशन को नियंत्रित कर कमजोरी दूर करता है।

आंवला कहां पाया या उगाया जाता है
आंवले के वृक्ष की पत्तियां इमली की पत्तियां जैसे ही होती हैं, लेकिन इसकी पत्तियां इमली से कुछ बड़ी होती हैं। आंवला बाग-बगीचों से लेकर जंगलों में पाया जाता है। बाग-बगीचों में आंवले के जो पौधे होते हैं उनमें जो फल आते हैं, वे जंगल में पैदा होने वाले फल की तुलना में बड़े होते हैं। ये समुद्र तल से 1300 मीटर की ऊंचाई पर भी पाया जाता है।

आंवले की खुराक
आमतौर पर आप आंवले का सेवन कई तरह से कर सकते हैं। आंवले का कच्चा फल, आमला जूस, आमला चूर्ण, आमला कैंडी या आंवले का मुरब्बा बनाकर इसका सेवन किया जा सकता है। इस लेख में ऊपर यह बताया गया है कि कौन सी बीमारी में कितनी मात्रा में आंवले का सेवन करना चाहिए। यहां यह बात ध्यान रखिये कि बहुत अधिक मात्रा में आंवले का सेवन करने से आंवला के नुकसान हो सकते हैं।

आंवला से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1-आंवला के सेवन से क्या नुकसान होता है?
सामान्यतः आंवला का प्रयोग करने से किसी प्रकार का कोई दुष्प्रभाव नहीं देखा गया है, लेकिन इसकी तासीर शीत होने के कारण इसका सर्दी में फल रूप में प्रयोग करने से बचना चाहिए।

2-आंवले की तासीर क्या है?
आंवले एक प्रकार का स्वादिष्ट फल होता है। जिसमें आयुर्वेद के अनुसार लवण रस को छोड़कर पांचों रस पाए जाते हैं, जिसमें अम्ल और कषाय प्रधान होता है। आंवले की तासीर शीत यानि ठंडी होती है अर्थात इसके सेवन से शरीर शीतल होती है।

3- क्या आंवला खाने से इम्यूनिटी बढ़ती है?
आंवले में कई ऐसे गुण होते हैं जो हमारे शरीर की रोगों से लड़ने की शक्ति बढ़ाने में मदद करते हैं. सर्दियों में सर्दी-जुकाम के साथ-साथ कई छोटी मोटी समस्याएं होती ही रहती हैं, ऐसे में अगर आप नियमित रूप से आंवले का सेवन करें तो इससे शरीर की इम्यूनिटी बढ़ जाती है. इम्यूनिटी मजबूत होने से इन सभी समस्याओं के होने की संभावना कम हो जाती है.

4- सर्दियों में आंवले का सेवन कैसे करें?
सर्दियों के दिनों में आप आंवले का सेवन कई तरीकों से कर सकते हैं। आप चाहें तो सीधे फल खा सकते हैं या फिर इसका जूस पी सकते हैं। सर्दियों में अधिकांश लोग इम्यूनिटी और शरीर की ताकत बढ़ाने के लिए च्यवनप्राश का सेवन करते हैं। च्यवनप्राश का मुख्य घटक भी आंवला ही होता है, इसलिए अगर आपको आंवले के फल या जूस का स्वाद पसंद नहीं है तो च्यवनप्राश के रूप में इसका सेवन कर सकते हैं। इसके अलावा बाज़ार में मिलने वाले आंवले के चूर्ण, कैंडी , कैप्सूल और मुरब्बे का भी उपयोग किया जा सकता है।

5- सर्दियों में आंवले का जूस कब पीना चाहिए?
आयुर्वेदिक चिकित्सकों का मानना है कि सर्दियों के दिनों में हर उम्र के लोगों को नियमित आंवले के जूस का सेवन करना चाहिए। इसके नियमित सेवन से पेट के रोग दूर होते हैं और शरीर स्वस्थ रहता है। रोजाना सुबह नाश्ते से पहले आंवले का जूस पीना ज्यादा फायदेमंद होता है।

Mathura Vrindavan

जब मरेंगे तो भगवान की कृपा को प्राप्त करेंगे। मनुष्य जीवन का लक्ष्य ही यही है।

Sadhvi Arya Pandit जिस दिन आपको नियम टूटने पर सही में बुरा लगने लगेगा, उस दिन के बाद नियम टूटेगा ही नहीं। मान लीजिए आप 500 रुपए के प्रॉफिट क...